काव्य हमारे संस्कारों में जन्म से अंतर्निहित है : डॉ विनोद नायक
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साहित्यिकी में झूमके बरसी काव्य की बदलियाँ
नागपुर। काव्य का उद्गम तो करुण रस से होता है लेकिन इसका स्वरूप अत्यंत व्यापक है। जन्म के साथ बधाई गीत में ये है, माँ की लोरी में है, माँ के घट्टी (चक्की) चलाते समय के गीतों में है, किसान के बोनी-बखरनी करते गीतों में है, पैदल चलते तीर्थयात्रियों के भजनों में है, यही नही धार्मिक त्यौहारों, विवाह व उत्सवों में गाये जाने वाले गीतों में काव्य का विशाल रूप देखने को मिलता है। ये अनवरत कई युगों से चल आ रहा है। कहने का तात्पर्य यह है कि काव्य हमारे संस्कारों में जन्म से अंतर्निहित है। उक्त वक्तव्य विदर्भ हिन्दी साहित्य सम्मेलन के साहित्यिकी के संयोजक डॉ विनोद नायक ने कवि सम्मेलन में व्यक्त किये। कार्यक्रम की अध्यक्षता कवि सतीश लाखोटिया ने की। अतिथि स्वागत सहसंयोजक शादाब अंजुम ने किया। संचालन संयोजक डॉ विनोद नायक ने किया।
कवि कृष्ण कुमार द्विवेदी ने "वो बचपन की बातें, वो छुटपन की यादें, राज-रानी अौर परियों के किस्से, रात में दादा-दादी से सुनते ये किस्से "रचना प्रस्तुत की। जयप्रकाश सूर्यवंशी ने "गम इंसान की यादों को भूला देता है, पाप घर की लक्ष्मी को भगा देता है" काव्य प्रस्तुति दी। प्रीति हर्ष ने "कभी लगता है आदमी इंसान है, कभी लगता है माचिस की तीलियों सामान है "कविता प्रस्तुत की। आरती तिवारी सनत ने माँ तुम्हारे हाथों की रोटी, आज भी याद आती है" कविता पेश की। शादाब अंजुम ने "जो शेरों में रवानी लग रही है, ख़ुदा की मेह्रबानी लग रही है" गजल पेश की। सतीश लाखोटिया ने "ठंडी हवाओं के झोंको के संग आओ, करे प्यार भरी बातें हम, न शिकवा, न शिकायत करेंगे, एक दूजे से हम, प्यार ही प्यार में खो जाएंगे हम और तुम "कविता प्रस्तुत की।
उमर अली अनवर ने "दर्द के नाम से डराते हो, या मेरा हौसला बढ़ाते हो "गजल पेश की। कवि विवेक असरानी, मीरा जोगलेकर, भरत गौरकर, तन्हा नागपुरी, हाजी जफर अली राही, सुरेन्द्र हरडे, ह्रदय चक्रधर, नीलिमा गुप्ता, गार्गी वशिष्ठ, दिनेश बागड़ी, रमेश मौदेकर, अकरम कुरैशी व समीर पठान ने अपने काव्य की बदलियाँ खूब बरसाईं। आभार विवेक असरानी ने माना।