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मन दरशन


एक जहाँ ऐसा भी हो,
आनंद ही आनंद हो,
निरानंद की छाया ना हो
मधुपानंद की बस माया हो।

मधुर मंद 
पवन के झोंके 
हृदय-वीणा तारों में जैसे, 
शुभ-प्रभात के
इस बेला में
पंछी कलरव-बीच बाग में,
योग ध्यान के निरवता में,
लोक-परलोक के परे हों जैसे,
सुखमय संगीत पसरे वैसे।

कोई ना टोके, 
कोई ना रोके,
अधीर मन के 
तूफान महीन हो,
शांत सागर में
समाएं जैसे।

हरि तुझको अर्पण है
जीवन बस समर्पण है 
मोह माया के इस भंवर में
तुझको ही सब निसार है।

- डॉ. शिवनारायण आचार्य 'शिव'
नागपुर (महाराष्ट्र)
काव्य 2363457331502959685
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