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सप्रेजी का साहित्य लोकधर्मी चिन्तन से अनुप्राणित है : प्रो. राम मोहन पाठक


नागपुर। पं. माधवराव सप्रे का साहित्य लोकधर्मी चिन्तन से अनुप्राणित है। उनके चिन्तन का मूल स्वर राष्ट्रीयता है। राष्ट्रीयता केवल एक तकनीकी शब्द नहीं है वरन यह हमारी अस्मिता, आत्मीयता, गौरव, स्वाभिमान, संस्कृति तथा आध्यात्मिक धरोहर का प्रतीक है। हमारी राष्ट्रीयता विश्व के लिए कल्याणकारी है। उक्त विचार व्यक्त करते हुए  वरिष्ठ विचारक प्रो. राम मोहन पाठक ने कहा कि पंडित माधवराव सप्रे भारतीय अस्मिता के प्रतीक थे।  

वे राष्ट्रसंत तुकड़ोजी महाराज नागपुर विश्वविद्यालय के हिन्दी विभाग तथा महाराष्ट्र राज्य हिन्दी साहित्य अकादमी, मुम्बई के संयुक्त तत्वावधान में पं. माधवराव सप्रे शोध संस्थान, रायपुर व महाराष्ट्र राष्ट्रभाषा सभा, नागपुर के सहयोग से आयोजित दो दिवसीय राष्ट्रीय संगोष्ठी के तृतीय सत्र को संबोधित कर रहे थे। प्रो. पाठक ने कहा कि राष्ट्रीय अस्मिता के साथ हमें दृढ़तापूर्वक खड़े होना होगा। इस अवसर पर सप्रे संग्रहालय की निदेशक डॉ. मंगला अनुजा ने विशिष्ट वक्ता के रूप में सत्र को संबोधित करते हुए सप्रे जी की स्त्री विषयक धारणा को रेखांकित किया। 

सत्र को आभासी माध्यम से संबोधित करते हुए केन्द्रीय विश्वविद्यालय, हैदराबाद के हिन्दी विभागाध्यक्ष प्रो. गजेन्द्र पाठक ने पं. माधवराव सप्रे की कहानियों का उल्लेख करते हुए उनके विचारों की प्रासंगिकता पर प्रकाश डाला। 'छत्तीसगढ़ मित्र' के संपादक श्री सुशील त्रिवेदी ने सप्रेजी के इतिहासबोध पर अपने विचार रखे। 

आभासी माध्यम से ही इन्दिरा गांधी राष्ट्रीय कला केन्द्र के सदस्य सचिव डॉ. सच्चिदानंद जोशी ने विचार व्यक्त करते हुए कहा कि हमारे देश का इतिहास आज भी औपनिवेशिक मानसिकता से ग्रस्त है। भारत के भौगोलिक, सांस्कृतिक, साहित्यिक और राष्ट्रीयता से जुड़े साहित्य को बड़ी गहनता से समझना युग की आवश्यकता है। सप्रेजी की राष्ट्रीयता भारत के विश्वगुरु होने का बोध कराती है। 

इसी सत्र में 'नवभारत' के संपादक संजय तिवारी ने कहा कि ''माखन की खोज 'माधव'' ही कर सकते थे। भारतीय लोग बौद्धिक रूप से सक्षम रहे, इसके लिए सप्रेजी के साहित्य का अध्ययन आवश्यक है। इस अवसर पर विभिन्न विश्वविद्यालयों से आए प्राध्यापकों तथा शोधार्थियों ने अपने शोध-पत्रों का वाचन किया।  

संगोष्ठी के चतुर्थ सत्र को संबोधित करते हुए  इस सत्र के अध्यक्ष वरिष्ठ साहित्यकार श्री गिरीश पंकज ने ''सप्रेजी का महत्त्व" विषय पर बोलते हुए कहा कि सप्रेजी का साहित्य केवल एक साहित्य मात्र नहीं है वरन वह भारत की अनमोल थाती है। ये साहित्यिक धरोहर केवल संचित करने के लिए ही नहीं है बल्कि इसे समाज में प्रसारित करने की आवश्यकता है।

"छत्तीसगढ़ मित्र" के प्रबंध संपादक प्रो. सुधीर शर्मा ने ''छतीसगढ़ मित्र " के पुनर्प्रकाशन की प्रक्रिया और चुनौतियों से सभी को अवगत कराया। यू. सी. एन. के प्रधान संपादक श्री राजेश कुमार सिंह ने कहा कि सप्रे जी हिन्दी पत्रकारिता के मानदंड थे।

राष्ट्रीय संगोष्ठी के समापन सत्र को संबोधित करते हुए नागपुर विश्वविद्यालय के वित्त और लेखाधिकारी प्रो. संजय कविश्वर ने कहा कि पत्रकारिता शस्त्र नहीं, मित्र होना चाहिए। इसका आदर्श सप्रेजी ने "छत्तीसगढ़ मित्र" प्रकाशित कर प्रस्तुत किया। इस सत्र में राष्ट्रभाषा प्रचार समिति, वर्धा के प्रधानमंत्री डॉ. हेमचन्द्र वैद्य ने कहा कि सप्रेजी के जीवन का केन्द्र नागपुर रहा है। गांधीजी और विनोबाजी की तरह सप्रेजी ने भी गीता के संदेशों पर कार्य किया। 

समापन सत्र के अध्यक्ष यशवंतराव चव्हाण प्रतिष्ठान के विश्वस्त डॉ. गिरीश गांधी ने कहा कि सही बात बोलने का साहस रखना चाहिए। इस दौर में चापलूसी हर जगह दिखाई देती है। जब हम अपने कार्य और दायित्व के प्रति प्रामाणिक रहेंगे तो बड़े से बड़ा कार्य सफलतापूर्वक सम्पन्न हो सकता है। आदर्शों का पाठ करने से समाज में परिवर्तन नहीं आता, बल्कि आदर्शों को व्यवहार में लाने से परिवर्तन होता है। इसलिए अपने वैचारिक विकास को हमें निरंतर बढ़ाना चाहिए। सप्रे जी का जीवन और साहित्य हमें इसकी प्रेरणा देता है।

डॉ. सुमित सिंह ने संगोष्ठी का प्रतिवेदन प्रस्तुत किया। सत्रों का संचालन  प्रा. जागृति सिंह, प्रा. नीलम वीरानी तथा डॉ. संतोष गिरहे ने तथा धन्यवाद ज्ञापन डॉ. एकादशी जैतवार व डॉ. गजानन कदम ने किया।समापन सत्र में धन्यवाद ज्ञापित करते हुए हिन्दी विभाग के अध्यक्ष डॉ. मनोज पाण्डेय ने  संगोष्ठी की प्रासंगिकता और सार्थकता  को रेखांकित किया। इस द्वि- दिवसीय राष्ट्रीय संगोष्ठी में देश भर से अनेक विद्वानों, शोधार्थियों तथा विभाग के विद्यार्थियों ने सहभागिता की।
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