वसुधैव कुटुम्बकम् के आदर्शों पर चलने वाले हम भारतीय !
तीन वर्ष पहले का एक दिलचस्प वाकया है, आध्यात्मिक समूह की कुछ महिला साधकों के साथ आभासी पटल पर आत्मीयता बढ़ने के उपरांत एक दूसरे से प्रत्यक्ष मिलने का अवसर मिला। सभी एक दूसरे के कायल तो थे ही, क्योंकि अध्यात्म में रूझान होने के कारण व्यक्तिगत परिचय में ज्यादा ध्यान न देते हुए विचारों और भावनाओं को निरंतर समझने से, मित्रता में प्रगाढ़ता आना स्वाभाविक था। मिलने के बाद धीरे-धीरे अपने असली अंदाज़ में आते ही, विभिन्न विषयों पर चर्चा आगे बढ़ पाती उससे पहले हम सभी के व्यक्तित्व के कुछ खास लक्षणों को प्रकाश में लाते हुए प्रेम व सद्भावना से परिपूर्ण कुछ हल्की-फुल्की टांग खिंचाई भी होने लगी।
तभी उनमें से एक ने सोशल मीडिया पर हमारे द्वारा सहभारतीयों/मित्रों को सम्बोधित करते समय अक्सर पारिवारिक रिश्तों के शब्दों के प्रयोग का विनोदपूर्ण शैली में उपहास उड़ाया। उन्होंने कहा "ये हमारी प्यारी शशि दीप की तो बात ही कुछ और है, ये तो पूरी दुनिया को भाई, बहन, चाचा, ताऊ, बना लेतीं है।" इस पर सभी ज़ोर से हँस पड़े और हमने भी हँसते हुए जवाब दिया, कि हमें ऐसा ही अच्छा लगता है, क्योंकि वैश्विक पटल पर हम पूरे विश्व को अपना परिवार समझते हैं, इसलिए उम्र व आत्मीयता के आधार पर सभी को यथोचित सम्मान देते हैं। खैर कोई बात नहीं हमारे ऐसे संबोधन को दूसरे चाहे किसी भी भाव से लें, पर हमें विचलित या हतोत्साहित होने की बिल्कुल आवश्यकता नहीं, क्योंकि यह हमारी महान भारतीय परंपरा है, सदियों पुराना प्रचलन है और हमें इस पर अत्यंत गर्व होना चाहिए।
आज जबकि देश के महान दार्शनिक और भारत माँ के अनमोल रत्न पूजनीय स्वामी विवेकानंद जी की जयंती है, उन्हें सादर नमन वंदन करते हुए हृदय प्रफुल्लित हुआ कि कुछ और नहीं तो उस महान आत्मा की विश्व प्रचारित उस शिष्टाचार को आत्मसात करने में सफल रहे जिन्होंने अंग्रेजी में भाषण देते हुए, भाईयों और बहनों के लिये प्यार और आत्मीयता के साथ "ब्रदर्स एन्ड सिस्टर्स" शब्दों से 1893 में शिकागो अमेरिका के विश्व धर्म सम्मेलन में उपस्थित अमेरिकनों तथा विश्व के कोने-कोने से आये प्रतिनिधियों का दिल जीत लिया, जिसके लिये लगातार 2 मिनट तक तालियाँ बजती रही और इसी महान विभूति ने संसार में भारतीय दर्शन की धाक जमा दी थी।
भारत की सुविख्यात सुक्ति वसुधैव कुटुंबकम के आदर्शों पर चलने वाले हम भारतीय युगों से पारिवारिक रिश्तों के शब्दों से ही सम्बोधित करते रहें हैं। यह हमारी गौरवशाली और उदार परंपरा है जिससे एक दूसरे के प्रति आत्मीयता, सहानुभूति व सहयोग की भावना बढ़ती है और इस गुण विशेष को अपनाते ही हमें संसार भर को अपना बना लेने और उसके साथ सामंजस्य स्थापित कर लेने की क्षमता प्राप्त हो जाती है। तब हमारे लिए कोई पराया नहीं रह जाता और हम स्वयं सबके प्रेमपात्र बने रहते हैं। इस प्रकार स्वामी विवेकानंद जी के द्वारा अपनाए गए कम से कम कुछ विचारों को भी पूर्ण निष्ठा के साथ आत्मसात करते हुए हम न केवल उनकी वर्षगांठ पर अपितु प्रतिदिन उन्हें सच्ची श्रद्धांजलि अर्पित कर सकते हैं।
- शशि दीप
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मुंबई