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छात्रों को बोलनें व अभिव्यक्त करने का अवसर प्रदान करना चाहिए : डॉ. गंगाधर वानोडे



नागपुर पुणे। विश्व हिंदी साहित्य सेवा संस्थान, प्रयागराज, उतरप्रदेश द्वारा राष्ट्रीय आभासी संगोष्ठी का आयोजन किया गया था जिसका विषय 'वर्तमान में शिक्षा का गिरता स्तर और शिक्षकों की भूमिका' पर मुख्य अतिथि  डॉ. गंगाधर वानोडे, क्षेत्रीय निदेशक, केंद्रीय हिंदी संस्थान, हैदराबाद, शिक्षा मंत्रालय, भारत सरकार ने कहां कि छात्रों को बोलने व अभिव्यक्त करने का अवसर प्रदान करना चाहिए। हम किस कक्षा में छात्र को पढ़ा रहे हैं उसकी मानसिकता के अनुसार पढ़ाने की आवश्यकता है। 

शिक्षक विद्यार्थियों को कितना ज्ञान दे पा रहे हैं यह महत्वपूर्ण है। अधिगम की प्रक्रिया भी सही होनी चाहिए। उच्चारण व लेखन दोनों का भी ज्ञान देना चाहिए। अध्यापन मे पाठयोजना बनाकर पढ़ाना बहुत ही आवश्यक है। शिक्षक विद्यार्थी को  नए नए तकनीकी का प्रयोग व व्यावहारिक शिक्षा के साथ जोड़ें। 

विश्व हिंदी साहित्य सेवा संस्थान, प्रयागराज के अध्यक्ष डॉ. शहाबुद्दीन नियाज मोहम्मद शेख, पुणे महाराष्ट्र ने गोष्ठी की अध्यक्षता की।
वक्ता डॉ. सुधा सिन्हा,पटना बिहार ने कहा कि शिक्षा का स्तर गिरता जा रहा है। माता - पिता का सम्मान ना करना, हाय - हेलो करना आज की परंपरा बन गई है। अतः अनुशासन पर नियंत्रण आवश्यक है  साथ ही नैतिकता की पहचान भी जरूरी है। प्राचीन समय में गुरुकुल में शिष्यों को एक अच्छी शिक्षा दी जाती थी। जिससे कि वह अपने गुरु का सम्मान करते थे।

डॉ. पुष्पेश पांडे, अध्यक्ष, शिक्षाशास्त्र अध्ययन मंडल, पं. रविशंकर शंकर शुक्ल विश्वविघालय, रायपुर, छत्तीसगढ़ ने कहा कि आज शिक्षा की स्थिति में चिंतन की आवश्यकता है। नई शिक्षा नीति 2020 में  काफी परिवर्तन दिखाई देता है जो  नयी पीढ़ी को शिक्षित बनाने मे सहायक होगा ताकि शिक्षा की गुणवत्ता को मापा जा सके। शिक्षकों द्वारा विद्यार्थियों को जीवन मूल्यों के  पाठ पढा़ना चाहिये।
डॉ. शोभना जैन, व्यारा गुजरात ने कहा कि शिक्षकों को आदर्श व कर्तव्यनिष्ठ बनने की आवश्यकता है। अध्यापक अध्यापन कार्य में दृश्य श्रव्य माध्यमों का प्रयोग करे। शिक्षक विद्यार्थियों की रूचि का भी ध्यान रखें। अध्यापन में संवादात्मक पद्धति अपनानी चाहिए। शिक्षा के गिरते स्तर के लिये एक नहीं, अनेक वर्ग जिम्मेदार हैं।

विश्व हिंदी साहित्य सेवा संस्थान, प्रयागराज, उ.प्र. के सचिव डॉ. गोकुलेश्वर कुमार द्विवेदी ने प्रास्ताविक भाषण में कहा कि  शिक्षकों को अपने स्तर को सुधारने की आवश्यकता है। साथ ही उन्होंने विश्व हिंदी साहित्य सेवा संस्थान की गतिविधियों पर प्रकाश डाला।

गोष्ठी की अध्यक्षता करते हुए विश्व हिंदी साहित्य सेवा संस्थान के अध्यक्ष डॉ. शहाबुद्दीन नियाज मोहम्मद शेख, पुणे, महाराष्ट्र ने अपने उद्बोधन में कहा कि शिक्षा पद्धति में नवाचार को लाना बहुत जरूरी है। नवाचार के अभाव में वर्तमान का विद्यार्थी डिग्री तक सीमित है। उच्च शिक्षा के विद्यार्थी नोट्स धारी बन गए हैं। अतः ज्ञान सीमित हो गया है। परीक्षा की पद्धति को बदलना आवश्यक है। प्राचीन काल में हमारे देश में स्तरीय उच्च शिक्षा का प्रावधान था अनेक विदेशी छात्र हमारे यहां शिक्षा पाने आते थें। परन्तु प्रचलित वर्तमान शिक्षा कमजोर बुनियाद पर खडी़ हैं। अतःविद्यार्थी में बौद्धिक विकास के साथ अनुशासन, सहिष्णुता, प्रामाणिकता और दायित्व बोध की भावना निर्माण करनी चाहिए।

गोष्टी का आरंभ रायपुर, छत्तीसगढ़ की हिंदी सांसद डॉ.मुक्ता कान्हा कौशिक की सरस्वती वंदना से हुआ। डॉ. जहीरूद्दीन पठान, नांदेड़, महाराष्ट्र ने स्वागत उद्बोधन दिया।

गोष्ठी का सफल एवं सुंदर संचालन, संयोजक, सांसद, छत्तीसगढ़ प्रभारी, डॉ. मुक्ता कान्हा कौशिक ने किया। श्रीमती पुष्पा शैली, रायबरेली ने आभार ज्ञापन किया। इस आभासी गोष्ठी में महाराष्ट्र से डॉ. भरत शेणकर, प्रा. रोहिणी डावरे, डॉ. नजमा मलिक, गुजरात, लक्ष्मीकांत वैष्णव, श्रीमती भुवनेश्वरी जायसवाल, कोरबा छत्तीसगढ़, सहित विभिन्न राज्यों के शिक्षाविद एवं गणमान्य नागरिक उपस्थित थे।
साहित्य 8007744459301076256
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