ताजा और उचित मूल्य की खुली वस्तुओं की बाजार में पुनः मांग
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ब्रांडेड, पैकिंग के दीर्घकाल तारीख को देखते हुए हो रहे बदलाव
नागपुर (आनन्दमनोहर जोशी)। पिछले दो वर्ष से कोरोनाकाल में अनेक पैकिंग खानपान,सौंदर्य प्रसाधन,पूजा सामग्री के साथ दैनिक उपयोगी वस्तुओं की दीर्घकालीन तारीख की वस्तुओं की खरीदी बिक्री का क्रेज घट रहा है। किराना बाजार में खुले खानपान की वस्तुओं में आटा, मैदा, सूजी , बेसन, एडिबल ऑयल, मूंगफली तेल, सोयाबीन तेल, सरसों तेल, शुद्ध देसी घी, डालडा घी, सौंदर्य प्रसाधन सामग्री, पूजा सामग्री, दही, दूध की खुली खरीदी, बिक्री का ट्रेंड बाजार में पुनः शुरू हो गया है।
अनेक मर्तबा खानपान सामग्री की पेकिंग की तारीख के साथ क्वालिटी भी बदली हुई लगती है। महामारी के बाद अधिकांश भारत के नागरिक खुली ताजा खानपान, गर्म नाश्ता, गर्म और ताजा भोजन को प्राथमिकता दे रहे हैं। शहर के अनेक बाजारों, बड़े मॉल, जनरल स्टार्स को छोड़कर छोटी किराना दुकान, छोटे होटल की ताजा खानपान सामग्री दुकानों, भारतीय किराना दुकान, होटल, भोजनालय में वापस भीड़ बढ़ने लगी है।
अनेक दैनिक प्रयोग की वस्तुओं में खानपान के अलावा कपड़ा, बर्तन, सौंदर्य प्रसाधन, रोजाना उपयोग आनेवाली दवाओं और जरूरी सामग्री के मूल्य, क्वालिटी, एक्सपायरी डेट के प्रति जागरूकता भी महामारी को देखते हुए बढ़ गई है। भारत में खानपान संस्कृति खानदानी पारंपरिक व्यवसाय पर टिकी है। कोरोनकाल के दो वर्ष में नागरिक आंख मींचकर पैकिंग की वस्तुएं बाजार से शीघ्र खरीद रहे थे। अनेक नागरिकों ने अत्यधिक उपयोगी वस्तुओं की खरीदारी भी की थी। भारतीय उपभोक्ता को बाजार में ताजा, गुणवत्ता की सामग्री उचित मूल्य में खरीदी के ट्रेंड में दिनोदिन बदलाव आ रहा है।
इसी के चलते छोटी हलवाई की दुकानों, छोटी किराना दुकानों, छोटी कपड़ा दुकानों से बिना ब्रांडवाली वस्तुओं की खरीदारी बढ़ने लगी है। इसका प्रमुख कारण पैकिंग वस्तुओं का वजन और बढ़ते दाम और घटिया क्वालिटी भी है। आज भी भारत के नागरिक सुबह शाम लगनेवाली जरूरी सामग्री में दही, दूध, शुद्ध देसी घी बर्तन में ताजा खरीदने पर विश्वास कर रहे हैं। वहीं छोटे हलवाई की नमकीन, ताजा मिठाइयों का क्रेज भी परिसर और स्वाद के अनुसार लौट रहा है। भारत के पारंपरिक खानपान के ढाबा, भोजनालय संस्कृति को वर्तमान में पुनः महत्त्व दिया जा रहा हैं।
लोग पीज़ा, बर्गर, चाइनीज के साथ दाल, चावल, रोटी, कढ़ी, दाल, बाटी, चूरमा आदि को होटल से ज्यादा छोटे भोजनालय को भी महत्व दे रहे है। भारत के अनेक शहरों में बिग बाजार,बड़े होटल गत दो वर्ष से कम चलन में आ रहे थे। हजारों साल पुरानी संस्कृति, हाथ से बनाए खानपान को महत्व मिलने से करोड़ों देशवासियों को रोजगार भी मिलने की उम्मीद जग रही है। लोग वापस अपने अपने काम में जा रहे है। जबकि महामारी के चलते विश्वस्तर पर अन्य देशों के साथ कार्यरत कंपनियों को भारी घटा हुआ। जिससे व्यापार चौपट भी हो गया।
भारतीय संस्कृति, पारंपरिक व्यवसाय को तेज गति मिलने से सबका साथ सबका विकास की जीवनरक्षक प्रणाली को भी प्रोत्साहन मिल रहा है। बाजारों में छोटी किराना, जीवनावश्यक दुकानों, छोटी होटल, छोटे भोजनालय में बढ़ती भीड़ इसका प्रत्यक्ष उदाहरण हैं। इसके अलावा प्रत्येक वस्तुओं की पेकिंग और जरूरी सामान की खरीदारी के प्रति भारत के उपभोक्ता जागरूक होकर खरीदारी कर रहे हैं।