पहनावे का विरोध कहीं अपनाने की स्वीकृति तो नहीं : विजय मोकाशी
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महाराष्ट्र राष्ट्रभाषा सभा में परिचर्चा संपन्न
नागपुर। आज नई पीढ़ी ने धर्म की सीमा लांघ हिजाब सा पहनावा अपना लिया है, विजय मोकाशी ने अध्यक्षता करते हुए कहा सभी वक्ताओं ने अभ्यासपूर्ण वक्तव्य हिजाब, क्रास, कड़ा, गमछे पर व्यक्त किए। आगे उन्होंने कहा प्रतीकों का विरोध कहीं उसे स्वीकार करने की और कदम तो नहीं।
परिचर्चा 26 फरवरी को महाराष्ट्र राष्ट्रभाषा सभा, शंकर नगर नागपुर में आयोजित हुई, जिसमे छात्रा अंजुम खान ने कहा पहनावा अपनी इच्छा पर निर्भर करता है, अगर जरूरत है तो इसे भी उसी रंग का ड्रेस कोड बना दे, जिस रंग का अन्य सहकर्मियों का हो तो शायद विवाद ना हो। योग शिक्षक शरद चित्रे कहते हैं रेगिस्तान की रेतीली हवाएं इस पहनावे की जनक थी, अब कई देशों में यह बैन है। अब बदलाव के वक्त अनुसार बदलाव की दस्तक सुने, अन्यथा जैसे आदिवासियों का नुकसान हुआ है इस पर विचार करे।
साक्षी कापसे का कथन था ड्रेस कोड से अमीरी गरीबी का भेद नहीं रहता, समानता वा संवाद की स्थिति में अपनत्व की भावना जागृत होती है। खुशी कांबले ने कहा महात्मा बुद्ध ने केसरिया रंग से धम्म की शुरुआत की जी बदलकर नीले रंग की पहचान बन शांति, समभाव का प्रतीक बन समता सैनिकों में आया। गमछा रूमाल का परिवर्तित रूप सा है। व्यक्ति पर निर्भर है वह जिसे अपनाए।
आगे ज्योतिराव लड़के ने दर्शन शास्त्र का मार्ग अपना कहा, प्रगति हमेशा निरर्थक वस्तुओं का त्याग पर ही निर्भर है। भूतकाल में इनकी निर्मती किसी प्रयोजन हेतु हुई होगी, क्या गोटमार जलकट्टू आदि आयोजन या मांगलिक होने के कारण विवाह नकारना ठीक हैं। आगे वक्ता डॉ. शशी वर्धन शर्मा का उच्चार के तिलक, धोती, कुर्ता आदि विज्ञान की दृष्टि में महत्व रखते हैं। धर्म की भावना हो और प्रतीक चिन्ह अगर सनातन परंपरा को कट्टर बनाते हों तो विचार जरूरी हैं हिजाब जैसे विवाद लोकतंत्र के लिए घातक हैं।
वसंत काले मानते हैं की बुर्का विरोध से अब बाजार फैंसी ड्रेस के रूप में निखार पर आ गया। तिलक, पगड़ी, मंगलसूत्र आदि भी धर्म से प्रश्न पूछ सकते हैं।सविधान की धाराएं को समझाते हुए विषय पर आपने बढ़िया प्रकाश डाला और पूछा अलीगढ़ विश्वविद्यालय में शेरवानी क्यों अनिवार्य है, प्रश्न उठेगा। सचिन चापले ने कहा हिजाब भारत के विघटन का बीज बो रहा है। पुराशवादी राजनीति का मसला है। भारत का लोकतंत्र 18 वीं शताब्दी सा नजर आ रहा है। सतिप्रथा से लेकर तीन तलाक तक बदलाव समाज के भीतर से ही आए। उन्होंने सविधान के दायरे में बदलाव को करने की न्यायप्रणाली की प्रशंशा की।
नरेंद्र परिहार ने सभी वक्ताओं के प्रस्तुत कथनों का समर्थन कर समझाया यह मुद्दा सौंदर्य प्रसाधन सामग्री बेचनेवाली कंपनियों का राजनीति का उपयोग कर खड़ा किया है। निज स्वतंत्रता का दायरा हो अभिव्यक्ति सा पहनावे में तो गलत नहीं परंतु इसका भान अन्य संप्रदाय पर भी होगा तब क्या गमछे, तिलक आदि पर प्रश्न हुए तो क्या करोगे । हमे प्रपंचों से अलग हट स्व विकास करना होगा तभी राष्ट्र विकसित होगा। हमे गुरु नानक देव की लंगर प्रणाली से अपनत्व व समभाव की भावना जागृत करने की जरूरत है।
डॉ. प्रकाश काशिव ने विषय की प्रस्तावना के साथ संचालन करते हुए कहा ड्रेस कोड के आदर की संकल्पना की और कहा नाहक विरोध हमेशा भारत के लोकतंत्र की खूबसूरती को खत्म करेगा। अंत में आभार संस्था की तरफ से नरेंद्र परिहार ने व्यक्त किया।