Loading...

वो हैं करोड़ पति


रुपैये का तकिया 
मखमली रज़ाई 
चांदी की तस्तरी पे 
खाये दूध मलाई।

हो जगुआर पे सवार 
उड़ते हवा में हैं 
बगल में रशियन बेबी 
फ़िक्र किसको है। 

बैंक का हो पैसा 
वजूद न कोई अपना 
सपने दिखाकर वो 
लूटते सपने हैं।

ना है विवेक कोई 
ना आबरू की चिंता 
ना कोई देश प्रेम 
सब कुछ बाज़ार है। 

है सिरफिरा ये भाई 
याद नहीं क्या आई 
ज़मीर की भी क़ीमत 
या सब हैं हरजाई। 

गरीब का है ये पैसा 
ये खेल भला कैसा 
पैदे ही मारे जाएं 
गाजर मूली के जैसा।

हो चली अंधेर - नगरी 
मेरी छोटी सी दुनिया,  
हर कोई लुटता है 
बाबू, मंत्री या बनिया।

दीननाथ हाथ थामो 
हमसे ये दूरी कैसी 
मेहनती मजूरों की त्राहि 
दिल को चीरे जैसा।  

- डॉ. शिवनारायण आचार्य 'शिव'
नागपुर, महाराष्ट्र
काव्य 8993645916209034788
मुख्यपृष्ठ item

ADS

Popular Posts

Random Posts

3/random/post-list

Flickr Photo

3/Sports/post-list