नारी दिवस पर विशेष
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जिसने बस त्याग ही त्याग किए,
जो बस दूसरों के लिए जिए..
फिर क्यों उसको धिक्कार दो,
उसे जीने का अधिकार दो..
आ गया है वो दिन फिर से जब हम नारी की बात करेंगे। बाकी साल भर तो वो ये विषय न के बराबर होता है। जैसे सब्जी में नमक हो तो कोई विशेष बात नही होती, पर जिस दिन सब्जी बिना नमक की हो तो सब्जी में कोई स्वाद नही होता।
आज कोरोना काल में कई परिवार ने अपने सदस्य खोए। पर जिस घर में विशेष तौर पर नारी खोई उस घर को आज पता चल रहा है, की वो घर का अहम हिस्सा थी। जब वो थी घर के सारे काम बिना बोले कर लेती थी ।पर आज वो नही है तो घर में नौकरों को भरपूर पैसा देने के बाद भी सुकून नहीं मिला पा रहा है।
नारी की तुलना प्रकृति से होती है।
जैसे सूरज हर रोज सुबह निकल कर रोशनी देता है। और बदले में कोई बिल नहीं भेजता।नदिया, पेड़, पौधे, परोपकार करते है, पर बदले में कोई उम्मीद नहीं करती।वैसे ही नारी सृजन करती है, पालन करती है और बच्चो के पीछे नाम पिता का होता है।
मकान को घर वो बनाएगी, पर घर के नाम प्लेट पर पुरुषो की होगी। और आज तक स्त्रियों ने इस बात पर कभी नाराजगी तक नही जताई।
आज वक्त आ गया है, जब कार्य को पुरष और स्त्रियों के मापदंडपर न जोड़ा जाए , बल्कि कार्य को कार्य के रूप में ही देखा जाए। लड़का है, इसलिए वो ये काम करेगा। तुम स्त्री हो? ये तुम्हे शोभा नही देता। कार्य को उसकी योग्यता के अनुसार नापा जाना चाहिए।
स्त्री जब शिव के साथ होती है तब वो शक्ति बन जाती है।, जब विष्णु के साथ होती हैं तो लक्ष्मी बन जाती है। और वो गौरी शंकर, लक्ष्मी नारायण कहलाए जाते है। तभी ईश्वर ने भी इन्हे अपने से पहले स्थान दिया है।
नारी दिवस न एक दिन छुट्टी की बात है, न ही स्त्रियों को आराम देने या उपहार देने की बात है।नारी दिवस है उसे आत्मसम्मान के साथ जीने की आजादी देने की।
नारी को वास्तु न समझकर उसकी भावनाओं की कद्र करो।क्योंकि नारी में जब तक करुणा है, तब तक प्यार की देवी है पर जब वो आक्रोश मे आती है, तब वो चंडी का रूप हो जाती है।
जियो और जीने दो। समाज, देश के कल्याण में सहभागी बनो।
- श्रीमती निशा विनोद चावला
खामला, नागपुर