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मिले राशनिंग पर पानी तो ना हो आश्चर्य !


जलसंकट से जूझ रही देश की 70 करोड़ जनता

नागपुर। अतिशीघ्र पानी यदि राशनिंग पर मिलने लगे तो कोई आश्चर्य की बात नहीं! अगले दशक में विश्वयुद्ध का कारण यदि पानी हो तो भी कोई आश्चर्य नहीं! धरती गरम होती जा रही है। पहाड़ों पर विशेषकर हिमालय की ऊंची पहाड़ियों पर हिम लुप्त होता जा रहा है। बढ़ते शहरीकरण के कारण ट्यूबवेल गहरे खोद खोदकर हमने पानी की सतह बहुत नीचे पहुंचा दी है। 

जिस देश में 70 प्रतिशत हिस्सा पानी से घिरा हो,वहां आज स्वच्छ जल उपलब्ध नहीं होना बड़ी गंभीर बात है। आज देश में लगभग 70 करोड़ लोग पानी के गंभीर संकट का सामना कर रहे हैं। करीब दो लाख लोग स्वच्छ पानी नहीं मिलने के कारण हर साल अपनी जान गंवा देते है। नीति आयोग द्वारा जारी 'समग्र जल प्रबंधन सूचकांक' रिपोर्ट में कहा गया है कि वर्ष 2030 तक देश में पानी की मांग उपलब्ध जल वितरण की दोगुनी हो जायेगी। मतलब करोड़ों लोग पानी के संकट से जूझेंगे।

दुनियां की वर्तमान आबादी लगभग 7 अरब है। इसमें 2050 तक दो अरब आबादी का और इजाफा होने की संभावना है। तेजी से बढ़ती आबादी को देख इनके लिए भोजन और जल की पूर्ति कर पाना एक विकट चुनौती है। देश में जल प्रदूषण की भी गहरी समस्या है। लगभग 114 शहरों में सीवेज की व्यवस्था ही नहीं है। संयुक्त राष्ट्र के अनुसार जल प्रदूषण के कारण करोड़ों लोगों में पेचिश, खुजली, हैजा, पीलिया जैसी अनेक बीमारियां फैलती है। ग्लोबल वार्मिंग संकट भी हमारे सामने है ही। 

पर्यावरण के जानकारों के अनुसार इसका 90 प्रतिशत कारण ग्रीन हाऊस गैसें ,वनों की कटाई और जीवाश्म का दहन है। पिछले एक दशक में पृथ्वी की सतह के औसत तापमान में 0.8 डिग्री सेल्सियस की वृद्धि हो चुकी है। इसमें 2 तिहाई की वृद्धि 1980 के बाद हुई। अनुसंधान से ज्ञात हुआ कि अलकनंदा घाटी के 15 प्रतिशत ग्लेशियर पूरी तरह नष्ट हो गए है। 

ग्लेशियरों के पिघलने से 15 प्रतिशत नदियों का अस्तित्व संकट में आ गया है। समुद्र का जल स्तर बढ़ता जा रहा है। इंटरनेशनल यूनियन फॉर कंजरवेशन फॉर नेचर की रिपोर्ट के अनुसार पिछली पांच शताब्दियों में 800 से अधिक वन्य जीव और वनस्पति प्रजातियां लुप्त हो चुकी हैं। जबकि 17 हजार प्रजातियां लुप्त होने के कगार पर हैं और 290 प्रजातियां गंभीर रूप से खतरे में है।                   

बहुत जल्द पानी राशनिंग पर मिलने लगे तो आश्चर्य नहीं होना चाहिए और इस स्थिति के लिए जिम्मेदार दूसरा कोई नहीं हम मानव जाति ही है। हमको ही इस स्थिति में सुधार लाना होगा। प्रकृति से खिलवाड़ तत्काल बंद करनी होगी। भयंकर जल संकट की स्थिति से उबरने के लिए हमें जल की एक एक बूंद को बचाना होगा। बताने की जरूरत नहीं कि व्यापक जलराशि को एकत्रित कर पानी की किल्लत को बहुत कुछ हद तक कम किया जा सकता है। 

भारत में लगातार कम होते भूमिगत जलस्तर को बढ़ाना होगा। हमारे देश की गोद में हजारों नदियां खेलती थी लेकिन उन हजारों में से अब सैकड़ों ही बची है।  इस स्थिति से उबरने के लिए वर्षा जल संचय कई मायने में महत्वपूर्ण है। वर्षा जल संचयन के लिए वर्तमान में कई वैज्ञानिक पद्धतियां एवं परंपरागत विधियों को अपनाया जा रहा है, अब इसमें और तेजी से बढ़ोतरी करना होगा। इन पद्धतियों में सतह जल संग्रहण प्रणाली, छत प्रणाली, बांध, भूमिगत टैंक आदि महत्वपूर्ण है।

पानी की इस भयावह स्थिति को देखते हुए अब भी हम सतर्क और सचेत नहीं हुए तो समझ लो हम खुद आत्म हत्या करने पर उतारू हैं। इसलिए जल संरक्षण के लिए हम सभी को सचेत, सजग और सक्रिय हो जाना चाहिए ताकि हमें भविष्य में जल संकट का सामना न करना पड़े।


- अजय पाण्डे

नागपुर (महाराष्ट्र)

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