नित नवीन आनंद मिले कि हम सदा के लिए तृप्त हो जायें!
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चीजों और लोगों को जोड़कर, शरीर को तरह तरह से उछाल कर गति देकर, चिल्लाकर चीखकर और कभी कभी चुप रहकर सोकर हम खुश होने की कोशिश करते हैं। कुछ देर की खुशी जैसी शय से रूबरू होते हैं। फिर थक कर जैसे थे दोबारा वैसे ही हो जाते हैं। जैसे इस तरह पैदा हुई हर खुशी आखिर में खत्म सी हो जाती है। फिर से नई खुशी जन्माने के और नए तरीके और खास मौके हम ईजाद करते हैं।
लेकिन नतीजे में मिलता है वही खुशी जैसी शय का कतई न टिकना। पर इससे मिली थकान निरन्तर रह जाती है। क्या पता कि जब हम कुछ न चाहें कुछ न जोड़ें कुछ न करें तो कुछ ऐसा हो कि हमेशा कायम रहने वाली रोज नई होते रहने वाली ऐसी खुशी मिले ऐसा नित नवीन आनंद मिले कि हम हमेशा हमेशा के लिए तृप्त हो जायें! इस रोज रोज की जीते रहने की थकान से परे के जीवन में सदैव के लिए डूब जाने के लिए! कौन जाने!
- प्रभाकर सिंह
प्रयागराज (उ. प्र.)
