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दर्जा पाना है बराबरी का


महिला दिवस, नहीं दिवस,
केवल एक दिन मनाने का,
पुरुषों के विरुद्ध, युद्ध का,
न ही कोई पर्व त्यौहार
एक दिन खुश होने का, और
न ही महिलाओं द्वारा महिलाओं
के सम्मानित होने का।

यह है एक अभ्यास अपने को
जानने पहचानने का,
अपनी पहचान बनाने का,
वस्तु से व्यक्तित्व  की ओर
कदम बढा़ने का।

अपने खोए हुए आत्म सम्मान को
पुनः: पाने का,
अपनी स्वतंत्रता,अस्मिता को
बनाए रखने का।

यह है सुअवसर,
अपने को स्मरण दिलाने का,
न हम दासी, न ही हैं देवी ,
हमें तो पाना है,
दर्ज बराबरी का
दर्जा बराबरी का।

- प्रभा मेहता
नागपुर, महाराष्ट्र

काव्य 2516264946904712033
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