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गहन चिंतन : स्वयं के होनेपन का, स्वयं की सत्ता का अन्तरतम भाव


अभी सब विस्मृत हो जाय, कुछ भी याद न रहे, यहां तक कि अपनी पहचान और अपना नाम तक भूल जायं तो क्या दशा होगी? यह अहंकार कि हम कुछ हैं, सब हवा हो जायेगा। पैदा होने के बाद से हर पल जोड़ी हुई स्मृतियों के पैबंद के सिवा खुद की क्या हैसियत समझ में आती है? गहराई से स्वयं के भीतर ढूंढ़ने से सांसारिक रूप से अपने कुछ होने के अहंकार का पता भी खोने लगता है। जो कुछ अर्जित किया लगता है, वह सब स्मृति मात्र है। 

सारी ममता, सारे सम्बन्ध, सारी सम्पत्ति, सारी विद्वत्ता, ज्ञान और अपने पुरुषार्थ का आडम्बरपूर्ण अहंकार, सब छोटी छोटी स्मृतियों के जोड़ मात्र हैं। जरा सा मष्तिष्क को झटका लगा, मष्तिष्क हिला, स्मृति का लोप हुआ कि सब कुछ गया। कुछ भी अपना कहने को नहीं याद आता। जैसे अपना मानने को कुछ बचता ही नहीं। प्रकृति प्रदत्त शरीर और मन की सत्ता की समझ मात्र बचती है। परन्तु उसमें भी अपनत्व का भाव पूर्णतः भ्रम-मुक्त नहीं रह जाता। बस एक वस्तु का होना तब भी अक्षुण्ण रहता है और वह है स्वयं के होनेपन का, स्वयं की सत्ता का अन्तरतम भाव। अपने इस होनेपन को, स्वयं की सत्ता के इस अक्षुण्ण भाव को कोई विस्मृति नहीं छीन पाती। यह सदैव बना रहता है। 

अनुभव नहीं है, अन्यथा कह सकते थे कि मृत्यु भी स्वयं की सत्ता को अस्तित्वहीन नहीं बना सकती। एक यही है जिसके साथ परिचय न होने जैसा भले लगे, पर जो सदैव सबसे निकट का सम्बन्धी है। क्योंकि यह अन्य नहीं अपितु स्व ही है, किन्तु जो सदैव विस्मृत सा रहता है, जिसकी ओर शायद ही कभी ध्यान जाता हो। और मानव-जीवन की यही सबसे बड़ी विडम्बना है।

- प्रभाकर सिंह
प्रयागराज* *(उ. प्र.)

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