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क्यों बढ़ रहे हैं वृध्दाश्रम : नरेंद्र सतीजा

                                                


नागपुर। समय के साथ साथ वृध्दाश्रमोें की संख्या में तेजी से इजाफा हो रहा है. सामाजिक संस्थाएं भी वृध्दाश्रमोें की स्थापना करने में विशेष रुचि ले रही हैं. सवाल यह है कि आखिर वृध्दाश्रमोें की जरूरत क्यों? यह तो हमारी संस्कृति नहीं है कि जिस माता पिता ने हम जन्म दिया और पाल पोसकर इस काबिल बनाया हम बुढ़ापे में उन्हें वृध्दाश्रम का रास्ता दिखा दें. 

प्राय: देखा गया है कि मां बाप चार पांच बच्चों की अच्छी परवरिश कर उन्हें आत्मनिर्भर भी बना देते हैं लेकिन यही बच्चे मौका आने पर मां बाप को अपने साथ रखना तक पसंद नहीं करते आखिर फिर वही रास्ता वृध्दाश्रम का दिखाया जाता है. मजे की बात तो यह है कि ऐसे मौके पर पुत्र एकता का परिचय देते हैं और बारी बारी से वृध्दाश्रम का खर्च उठाने को तैयार रहते हैं. 

आज के तथाकथित आधुनिक दौर में संयुक्त परिवार तेजी से टूट रहे हैं. विशेष रूप से युवा पीढ़ी दखलंदाजी बिल्कुल पसंद नहीं करती. मां बाप बड़े अरमानों से बच्चों की इच्छानुसार उनका घर बसा देते हैं और आदर्श परिवार की कल्पना में खो जाते हैं. बाद में यह तो बस कल्पना ही रह जाती है और मनमुटाव शुरू हो जाते हैं. 

आखिर वो दिन भी आता है जब मां बाप को वृध्दाश्रम का रास्ता दिखा दिया जाता है. मेरा वृध्दाश्रमोें में जाने का सिलसिला जारी रहता है. वहां जाने पर रहने वाले बुजुर्गो से बातचीत भी होती है. सभी की अपनी दर्द भरी दास्तान होती है. बावजूद तमाम दर्द के ये अपने आप को खुश रखते हैं. आज के दौर को अब  मां बाप घबराने लगे हैं कि उनके साथ कैसा होगा. डर तो होता कि कहीं उन्हें भी वृध्दाश्रम तो जाना नहीं पड़ेगा. 

अपने माता-पिता को वृद्धाश्रम का रास्ता दिखाने वाले बच्चे यह भी समझ लें कि कल उनकी भी बारी है. जैसा सलूक वे माता-पिता के साथ कर रहे हैं, उनके साथ भी उनके बच्चे वैसा ही सलूक करेंगे तो कैसा रहेगा. आखिर जैसी करनी वैसी भरनी. वैसे अभिभावक भी यह समझ लें कि बुजुर्गों के हित में अनेकों कानून बनाए जा चुके हैं और उन्हें घर से निकाला नहीं जा सकता. 

जरूरी यह है कि वक्त आने पर कानून का सहारा लेने में बिल्कुल न संकोच न करें. बेशक वे आपकी संतान हैं लेकिन उन्हें सबक सिखाना जरूरी है. आखिर मां बाप क्यों रहें डरे डरे और वृध्दाश्रम क्यों रहे भरे भरे.

समाचार 96206113014504649
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