जरूरी दवा के मूल्य सस्ते होने से मिलेंगी राहत
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रक्त दाब, मधुमेह, सामान्य ताप, कैंसर बीमारी दवाओं को सस्ता करना जरूरी
नागपुर (आनन्दमनोहर जोशी) दैनिक कामकाज और व्यस्तता के वर्तमान समय में समाज के सभी वर्ग कुछ ना कुछ चिंता, समस्या से जूझ रहे है ।जिसके फलस्वरूप बीमारियां शारीरिक व्याधियां निरंतर बढ़ते ही जा रही है। देशभर में कुछ स्थानों पर जीरो कोविड और महामारी के सम्पूर्ण ख़त्म होने के प्रयास सफल हो रहे है। वहीँ कुछ समान्य, साधारण , घातक बीमारियां इंसान के घर, गृहस्थी, शांति को तबाह कर देती है। ऐसे में राष्ट्रिय औषधि मूल्य निर्धारण प्राधिकरण द्वारा हाल ही में मधुमेह समेत अनेक बीमारियों के इलाज के दौरान प्रयोग में आनेवाली 15 महत्वपूर्ण दवाओं के खुदरा मूल्य तय किए है।
वह स्वागत योग्य कदम है। कुछ दवाएं डॉक्टर अपने पर्ची पर चार दिन के लिए सुबह, दोपहर,शाम ऐसे लिखकर देते हैं। ऐसे में कुल 12 गोलियां या कैप्सूल मरीजों को लेनी होती है। कुछ दवाएं मरीज जिन्दगी भर लेते है। उनमें उच्च रक्तचाप, मधुमेह, केंसर जैसी दवाएं है। जो कि एक माह की, पंद्रह दिन, सप्ताह के हिसाब से मरीज लेते है। ऐसी कुछ दवाओं के सम्पूर्ण स्ट्रिप्स को दवाई की दुकानों ने लेना जरूरी करके रखा है। यह एकत्र दवा पत्ता पंद्रह नग का रहता है। यह दवाइयां एक,दो खुदरा कीमत में जरुरतमंद को नही मिल पाती है। ऐसी दवाओं की पंद्रह गोलियों और कैप्सूल के पत्ती के जगह पांच गोलियां, कैप्सूल के पत्ते सुलभ कराए जाए, तो मरीजों को सुविधा होंगी।
जरूरी दवाओं को जी एस टी और टैक्स मुक्त के साथ जितनी आवश्यकता हो उतनी दवाई जरूरतमंद को दवा दुकानों से देने के प्रावधान भी जरुरी है। आज पेट्रोल, डीजल, रसोई गैस की कीमत अंतरराष्ट्रीय स्तर पर बढ़ रही है।जिससे जरूरी वस्तुओं, डॉक्टर की सलाह फीस के साथ दवाइयों के दाम भी बढ़ चुके हैं। कभी कभी तो डॉक्टर की सलाह फीस 500 रुपए और दवाई का मूल्य 2000 रुपए तक होने से आम,साधारण परिवार का बजट भी बिगड़ जाता है।कभी कभी दस रुपए की दवाई के लिए सलाह फीस तगड़ी देनी होती है। जबकि आज अनेक वस्तुओं पर जी एस टी लगने से और ईंधन के भाव बढ़ने से चावल के मूल्य बाज़ार में दस रुपए प्रति किलो और गेहूं के मूल्य में 6 रुपए प्रति किलो भाव तेज हो चुके है।
चावल के पहले एक किलो के भाव 60/- से बढ़कर 70 /- रुपए प्रति किलो और गेहूं के एक किलो के भाव बढ़कर 29/- के स्थान पर 34 /- रुपए प्रति किलो हो चुके है। यही नहीं लाल मिर्च पीसी हुई जैसी रोजाना उपयोगी वस्तु के दाम 440/- रुपए प्रति किग्रा से बढ़कर 680/- रुपए प्रति किलो हो चुके है। केवल काम करनेवाले रोजाना कामगार की तनख्वाह दस साल पुराने मूल्य की तरह रह गई है। भारत में अब वस्तुओं के मूल्य अंतर्राष्ट्रीय स्तर की तरह होते जा रहे है। और नागरिकों की पगारों में किंचित मात्र की बढ़त नहीं होने से जनजीवन प्रभावित हुआ है।सरकार द्वारा दवा मूल्य को कम किया गया उसी तरह ईंधन, बिजली, पानी और अत्यावश्यक वस्तुओं पर भी ध्यान देना जरूरी है। पूर्व सरकारों के समय एक ओर सब्जियों के दाम मात्र 2.50 (ढाई रुपए प्रति किग्रा ) रहते थे ।
आज उन्हीं सब्जियों के दाम 20 रुपए से 40/-,60/-,80/-,100/- रुपए तक बढ़ चुके हैं। आम साधारण में 10/- रुपए के 5 नग नींबू अब 10/- रुपए का एक नग मिलने लगा है। लगता है भारत में अंतर्राष्ट्रीय स्तर के भाव हावी हो रहे है। हां यह सच है कि ईंधन के मूल्य बढ़े हैं। लेकिन मूल्य प्रणाली पर नियंत्रण नहीं होने से देश की जनता की जीवनप्रणाली विश्वस्तर पर युद्ध को रोकने यूक्रेन, रूस को बाध्य होना ही पड़ेगा। तभी जाकर दुनियां के देशों की आर्थिक स्थिति में सुधार आ सकता है। वैसे भी पूर्व समय में पेट्रोल, रसोई गैस के बढ़े दाम आज तक कम होने का नाम नहीं ले रहे हैं।साथ साथ अन्य वस्तुओं के दाम भी आसमान छूने लगे हैं। सरकार को इस ओर ध्यान केंद्रित करने की सख्त आवश्यकता है।