महाराष्ट्र राष्ट्र सभा में कवि सम्मेलन संपन्न
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नागपुर। महाराष्ट्र राष्ट्रभाषा सभा के चिंतन कक्ष में अध्यक्षता करते हुए वरिष्ठ कवि, साहित्यकार 'डॉ शशि वर्धन शर्मा शैलेश' ने कहा, आज कवि सम्मेलन में सभी ने विभिन्न रसों से सराभोर कविताओं से सभा को रंगारंग कर दिया। इसके साथ ही उनकी कविता के बोल थे - आंसू की परिभाषा में तो भाव अनेकों मन भरमाते, मन में यदि अति उमंग है तो आंख से आंसू बाहर आते।
इसी क्रम में कवि 'अरुण धारपुरे' ने 'युद्ध' पर सुंदर कविता प्रस्तुत की 'नरेंद्र परिहार' की व्यंग प्रधान, सामाजिक उद्देश्य को लेकर कविता थी 'कुछ भी अंतिम नहीं होता'। इसी क्रम में 'रविंद्र देवघरे शलभ' व 'प्रकाश काशिव' ने अपनी सटीक टिप्पणियों से कविताओं की समीक्षा भी की। 'डॉ बालकृष्ण महाजन' ने हास्य कविता 'चुनाव का माहौल" उनकी तस्वीर देख कर मैं हैरान हो गया,
जो इंसान न बन सका वह भगवान हो गया।
'विजय कुमार श्रीवास्तव' ने प्रशासन को केंद्र में रखकर उसे यथार्थ 'मैं प्रशाशन हूं' कविता में साकार किया। 'पारसनाथ शर्मा' के एक गीत के बोल थे घर भी अब तो घर नहीं लगता, मरने से भी अब डर नहीं लगता। 'सुधा काशिव' ने अपनी गीतिका के माध्यम से कहा - धूप में जब गर्म हो मिजाज आपका, धरती से सहन करने की ताकत ले जुदा हुए। इसके साथ ही 'गुरु प्रताप शर्मा आग' की गजल के बोल थे - चलाओ अब जुल्म अब यहां हुकूमत मुर्दों से ही चलेगी, जो जिंदा हैं उन्हें भी खबरदार करें।
'तेजवीर सिंह' ने ग़ज़ल के माध्यम से अपने विचार यूं रखे, बहुत गुमां था जिनको अपने शरीफ होने का, न आया कोई सलीका न सरूर देखिए।
'सुरेखा देवघरे' की कविता के बाद 'कृष्ण कुमार द्विवेदी' ने जहां पंक्तियों के साथ कवियों को प्रस्तुत करते हुए एक समा बांधा तो अपनी कविता में हिंदी मराठी भाषा को लेकर तुलनात्मक विवेचन कर कहा - दोनों ही साहित्य की गहना हैं, जब दोनों ही मिल जाए तो क्या कहना है। कार्यक्रम का संचालन "डॉ कृष्ण कुमार द्विवेदी" ने किया व आभार संस्था की तरफ से 'प्रकाश काशिव जी ने माना।
