अंतर्राष्ट्रीय सद्भावना में शिक्षा की भूमिका महत्वपूर्ण : प्रो. के.पी. यादव
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नागपुर/रायपुर। अंतर्राष्ट्रीय सद्भावना ,शांति और सहयोग के विकास में शिक्षा की भूमिका अत्यंत महत्वपूर्ण है। इस आशय का प्रतिपादन मैट्स विश्वविद्यालय, रायपुर, छत्तीसगढ़ के कुलपति प्रोफेसर के. पी. यादव ने किया।
महात्मा गांधी अंतरराष्ट्रीय विश्व शांति केंद्र तथा हिंदी विभाग, मैट्स विश्वविद्यालय, रायपुर, छत्तीसगढ़ के तत्वावधान में 'अंतरराष्ट्रीय सद्भावना में शिक्षा का योगदान' विषय पर आयोजित अंतर्राष्ट्रीय आभासी संगोष्ठी में वे अपना उद्बोधन दे रहे थे।
नागरी लिपि परिषद, नई दिल्ली के कार्यकारी अध्यक्ष डॉक्टर शहाबुद्दीन नियाज मोहम्मद शेख,पुणे, महाराष्ट्र ने गोष्ठी की अध्यक्षता की। कुलपति प्रोफेसर यादव ने आगे कहा कि मूल्य आधारित व रोजगार परक शिक्षा की नितांत आवश्यकता है। शैक्षिक स्तर को बढ़ाने हेतु पाठ्यक्रम में व्यावहारिक शिक्षा का भी समावेश हो।
गोष्ठी के मुख्य अतिथि श्री सुरेश चंद्र शुक्ल ‘शरद आलोक’ ओस्लो, नार्वे ने अपने मंतव्य में शिक्षा में संवाद की आवश्यकता प्रतिपादित करते हुए नार्वे में चल रही शिक्षा पद्धति पर प्रकाश डाला। उन्होंने कहा कि नार्वे में शिक्षा के माध्यम से बच्चों को सभी धर्मों व संस्कृति की जानकारी दी जाती है।
नागरी लिपि परिषद नई दिल्ली के कार्यालय मंत्री श्री. अरुण कुमार पासवान ने इस अवसर पर कहा कि अंतरराष्ट्रीय स्तर पर आज तक जितने भी आविष्कार हुए हैं, उनका एकमात्र आधार शिक्षा ही है। शिक्षा की उपलब्धि नैतिकता के होने से मनुष्य तथा पशुओं में अंतर है।
नागरी लिपि परिषद, नई दिल्ली के महामंत्री डॉ. हरिसिंह पाल ने अपने उद्बोधन में कहा कि शिक्षा अज्ञान रूपी अंधकार को दूर करती है। अतः शिक्षा में नवीनता का समावेश हो। शिक्षा से हिंसा दूर होकर शांति की स्थापना हो सकती है।
हिंदी विभागाध्यक्ष डॉ. रेशमा अंसारी ने कहा कि अंतरराष्ट्रीय सद्भावना हेतु मनुष्य संकुचित दृष्टिकोण का त्याग करें तथा उच्च विचार, प्रेम, दया, करुणा, सहानुभूति जैसे तत्वों का अंगीकार करें।
गोष्ठी की अध्यक्षता करते हुए डॉ. शहाबुद्दीन शेख, पुणे ने कहा कि शिक्षा देश व समाज की रीढ़ है। शिक्षा से मनुष्य में समझदारी आती है। भारत प्राचीन काल से ही शिक्षा के प्रति जागरूक रहा है। विश्व के सम्मुख जो बड़ी चुनौती उभरी है वह है, साथ साथ रहना सीखना। आज विश्व के जन एक दूसरे के पड़ोस में आ गए हैं पर दुख है कि वे पड़ोसी नहीं रहे।
इस नकारात्मकता को नियंत्रित करने का काम शिक्षा ही कर सकती है। नई राष्ट्रीय शिक्षा नीति शोध, नवाचार तथा नई तकनीक के विकास पर बल देते हुए अंतरराष्ट्रीय सद्भावना में अपना अमूल्य योगदान करेगी।
डॉ. सुनीता तिवारी ने गोष्ठी का संचालन किया तथा डॉ. रेशमा अंसारी ने आभार प्रदर्शन किया।