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देश और समाज में बढ़ रही हिंसा को रोकने भाषा पर लगाम जरूरी


नागपुर
(आनंदमनोहर जोशी). देश में बढ़ रही अराजकता, अन्याय अत्याचार, हिंसा, अपराध समाज के साथ सरकार के लिए भी खतरा है। विश्व में करीब 56 देशों में लोकतंत्र है। जिसमें जनसंख्या के मामले में भारत देश पहले क्रमांक का लोकतंत्र का देश है। हम उस देश के वासी है जिस देश में गंगा, गोदावरी, कृष्णा, नर्मदा, काशी, सिंधु नदी, सरस्वती नदी के पवित्र जल से पूजा में संकल्प लिया जाता है। न्यायालय में पवित्र ग्रंथों पर हाथ रखकर न्यायाधीश कटघरे में खड़े पक्षकार के विश्वास, आत्मविश्वास पर निर्णय लेते है। यही नहीं जिस संसद भवन, विधान भवन में जनता के चुने गए प्रतिनिधि अपनी शपथ लेते है, कि देश की एकता, अखंडता, भाईचारा के प्रति जिम्मेदार रहूंगा। 

उसी संसद में पिछले पचहत्तर वर्ष से असंसदीय शब्दों का प्रयोग होने से लाखों नागरिकों को निर्दोष होने पर भी उसके दुष्परिणाम भुगतने पड़े। अब जबकि भारत सरकार के लोकसभा के सभापति की उपस्थिति में असंसदीय शब्द की पुस्तक जारी की गई है। ऐसे में कुछ पूर्व सांसद, वर्तमान सांसद संसद की भाषा में हो रहे सुधार का विरोध जता रहे है। जबकि भारत का संविधान ब्रिटिश शासन काल का पुराना कानून व्यवस्था का हिस्सा है। मौजूदा आधुनिक समय में अभूतपूर्व सुधार हुए है। जिससे मानव संसाधन, मनुष्य के जीवन में शांति, रोजगार, स्वयंरोजगार, उद्योग ,व्यापर, शिक्षा नीति, मजदूर को रोजगार, कल्याण, भविष्यनिधि, पेंशन के बारे में संसद में चर्चा के स्थान पर बेतुके बोल, गाली गलौच कर असभ्य वातावरण का निर्माण हो रहा है। 

ऐसे समय में देश को सही दिशा देने के कार्य, प्रश्न उत्तर सांसद पूछे तो देश प्रगति करेगा। ऐसे शब्द जो कि संसद सदस्य, प्रधानमंत्री और देश की गरिमा के साथ समाज के वर्गों को ठेस पहुंचाए। बेतुके बोल, बेतुके वक्तव्यों के भाषण पर भी कठोर निर्णय लेना अत्यंत जरूरी है। हमारे देश की न्यायपालिका, पुलिस प्रशासन, सरकारी कार्यालय, निजी अस्पतालों, सरकारी अस्पतालों के साथ सार्वजनिक स्थानों पर बोली जाने वाली भाषा को भी शालीनता के दायरे में लाना होंगा। शब्दों के अपशब्द से फैल रहे धार्मिक उन्माद को प्राथमिक शिक्षा की पुस्तकों से भी निकलना जरूरी है। साथ ही बॉलीवुड, हॉलीवुड की फिल्म, दूरदर्शन चैनल्स पर प्रसारित समाचार, खबरों पर भी बेतुके शब्दों पर नियंत्रण करना जरूरी है। 

इसके लिए सूचना प्रसारण मंत्रालय से असंसदीय भाषा का कानून लाकर देश में बढ़ रहे अशांत वातावरण पर नियंत्रण किया जा सकता है। साथ ही सांसद के आचरण, भाषा की लिखित परीक्षा और सांसद के संसद भवन में शपथ के दौरान असंसदीय शब्दों के इस्तेमाल नहीं करने की निष्ठा के प्रति लिखित शपथ पत्र को समाविष्ठ करना होंगा। 75 वर्षों में जनता के चुने हुए प्रतिनिधियों ने अपशब्द कहे जो कि संसद के रिकॉर्ड से निकाले गए। लेकिन यही गलती बार बार होंगी, तो संसद भवन में महत्वपूर्ण प्रश्नकाल के समय नष्ट होंगा। इसलिए भाषा, नियम के प्रति अनुशासन भी जरूरी है। अतः देश की शिक्षा प्रणाली में कुरीतियां, अभद्र शब्द रचना को निकालकर सुधार करना होंगा।
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