नारी की असली पहचान उसकी वेशभूषा है : डॉ. वंदना चराटे
नागपुर/पुणे। भारतीय संस्कृति में नारी की असली पहचान उसकी वेशभूषा है। सबसे सुंदर वेशभूषा साड़ी है। परंतु वर्तमान में साड़ी का स्थान दूसरे वस्त्रों ने ले लिया है। इस आशय का प्रतिपादन डॉक्टर वंदना चराटे, अध्यक्ष, हिंदी अध्ययन मंडल, देवी अहिल्या विश्वविद्यालय, इंदौर, मध्य प्रदेश ने किया। विश्व हिंदी साहित्य सेवा संस्थान, प्रयागराज, उत्तर प्रदेश के तत्वावधान में 117 वीं गोष्ठी के विषय ‘महिलाओं की वर्तमान वेशभूषा’ पर मुख्य अतिथि के रूप में वे अपना उद्बोधन दे रही थी । विश्व हिंदी साहित्य सेवा संस्थान, प्रयागराज, उत्तर प्रदेश के अध्यक्ष डॉ. शहाबुद्दीन नियाज़ मुहम्मद शेख, पुणे, महाराष्ट्र ने गोष्ठी की अध्यक्षता की।
डॉ. वंदना ने आगे कहा कि महिलाओं की वेशभूषा गरिमा पूर्ण होनी चाहिए। परिणामत: वेशभूषा स्वास्थ्य, संवेदना और मर्यादा की परिधि पर आधारित होनी चाहिए। विश्व हिंदी साहित्य सेवा संस्थान, प्रयागराज के उपाध्यक्ष श्री. ओम प्रकाश त्रिपाठी, सोनभद्र, उत्तर प्रदेश ने विशिष्ट वक्ता के रूप में कहा कि भारतीय समाज नारी प्रधान है। वर्तमान नारी को आधुनिक युग की वेशभूषा की प्रतिस्पर्धा व ईर्ष्या से बचना चाहिए। पाश्चात्य संस्कृति के प्रभाव में महिलाओं की वेशभूषा में जो बदलाव आ रहा है, उस पर विचार होना आवश्यक है।
डॉ. सुधा सिन्हा, पटना, बिहार ने कहा कि परिधान व्यक्तित्व को प्रतिबिंबित करता है। स्त्री अपनी संस्कृति के अनुरूप परिधान करेगी, उतनी वह सुंदर दिखेगी। डॉ. माधुरी त्रिपाठी, रायगढ़, छत्तीसगढ़ ने कहा कि आधुनिक महिलाएं साधारण वेशभूषा अपनाएं। प्रा. रेखा वर्मा, चेन्नई, तमिलनाडु ने अपने मंतव्य में कहा कि भारतीय सौंदर्य वेशभूषा में ही झलकता है। आधुनिकता की अंधी दौड़ में अंग प्रदर्शन करना गौरव की बात नहीं है। ज्यादातर तंग वस्त्रों का प्रयोग स्वास्थ्य के लिए भी हानिकारक है। अतः परिधान का चयन सोच समझकर करना चाहिए।
डॉ. भारती दोडमनी, कारवार, कर्नाटक ने कहा कि पूरे विश्व में हमारी पहचान वेशभूषा से है। वर्तमान में महिलाओं की वेशभूषा में आया परिवर्तन चिंता का विषय है। डॉक्टर शहाबुद्दीन नियाज मुहम्मद शेख, पुणे, महाराष्ट्र ने अध्यक्षीय उद्बोधन में कहा कि पारंपरिक रूप से हमारे देश में नारी को घर की लक्ष्मी माना जाता है। 24 जुलाई 1991 को वैश्वीकरण, उदारीकरण तथा निजीकरण की नीतियाँ जब हमारे यहां लागू कर दी गई तब से भारतीयों की जीवन शैली अत्यंत प्रभावित हुई। फैशन में अग्रसर होती महिलाएं स्वयं को प्रगतिशील मानने लगी। परिणामत: अनेक पारिवारिक समस्याएं निर्माण होने लगी। परंपरागत जीवन शैली में ही दांपत्य जीवन का वास्तविक आनंद है। अतः भारतीय सभ्यता व संस्कृति के अनुरूप ही वेशभूषा का चयन होना चाहिए।
इस अवसर पर डॉ. प्रेमलता चुटैल, उज्जैन, मध्यप्रदेश, श्रीमती सुवर्णा जाधव, मुंबई, डॉ. नजमा मलेक नवसारी, गुजरात तथा श्रीमती माधुरी बेनके, नासिक, महाराष्ट्र ने भी संक्षेप में अपने विचार रखें। विश्व हिंदी साहित्य सेवा संस्थान, प्रयागराज के सचिव डॉ. गोकुलेश्वर कुमार द्विवेदी ने प्रस्तावना की। सरस्वती वंदना प्रा. रोहिणी डावरे, अकोले ने की। श्रीमती पुष्पा श्रीवास्तव ‘शैली’ रायबरेली, उत्तर प्रदेश ने स्वागत उद्बोधन दिया। गोष्ठी का सफल व सुंदर संचालन डॉ. मुक्ता कान्हा कौशिक, हिंदी सांसद, रायपुर, छत्तीसगढ़ ने किया तथा डॉ.सरस्वती वर्मा, महासमुंद, छत्तीसगढ़ ने आभार ज्ञापित किए। उक्त गोष्ठी में डॉ. भरत शेणकर, डॉ. ऐनूर शेख, प्रा. मधु भंभाणी, नागपुर, डॉ. रूपाली चौधरी जलगाँव , डॉ. रश्मि चौबे, गाजियाबाद, लक्ष्मीकांत वैष्णव, चापा, छतीसगढ़ सहित महाराष्ट्र के राहाता महाविद्यालय के हिंदी विभाग के सभी विद्यार्थी झूम पटल पर बड़ी संख्या में उपस्थित थे।
