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नैतिक, व्यावहारिक, मूल्यवर्धक और रोजगारपरक शिक्षा की जरुरत


नागपुर (आनन्दमनोहर  जोशी)। हज़ारों ही नहीं लाखों वर्ष से वैदिक, सांस्कृतिक, आयुर्वेदिक, पौराणिक क्षेत्र का भारत में महत्त्व रहा है. प्रकृति के अनुसार सूर्य अपने प्रकाश का तेजोमय रोज़ाना दे रहा है. 

रात और दिन प्रकृति के नियम उजाला और अन्धेरा लेकर आते है. मनुष्य ही एक ऐसा जीव है जिसमें करुणा, दया, अहिंसा, सत्य और परमोधर्म की भावना रही है. जिसके प्रत्यक्ष उदाहरण प्रभु श्रीराम, कृष्ण के साथ गौतम बुद्ध, महात्मा गांधी, विनोबा भावे जैसे महापुरुष के आदर्श, त्याग और बलिदान है. अब तक सरकारों द्वारा इतिहास, भूगोल, विज्ञान, गणित की शिक्षा दी जाती रही है. 
हाल ही में  हैदराबाद के केशव मेमोरियल एजुकेशन सोसाइटी के एक समारोह में भारत की राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मू ने नैतिक शिक्षा को पाठ्यक्रम में समाविष्ट करने का वक्तव्य देते हुए भाषण दिया।

यह अत्यधिक सोच, शोध, विज्ञान, सांस्कृतिक विषय भी है.जो कि आज़ादी के अमृत महोत्सव पर अनेक वर्ष बाद भारत के किसी राष्ट्रपति ने सार्वजानिक तौर पर की है. वर्तमान समय में कुछ पाठ्यक्रमों को छोड़कर अनेक पाठ्यक्रमों का दैनिक जीवन में महत्त्व नहीं रहता. भारत देश के शिक्षा मंत्रालय को सभी राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों को उचित शिक्षा और पाठ्यक्रमों को शुरू करने के आदेश शीघ्र देना होगा. अब जबकि दो, तीन वर्ष से महामारी के कारण लोगों के रोज़गार, व्यापार, शिक्षा और दैनिक जीवन की गतिविधियों में बदलाव आया है. 

भारत ही नहीं  विश्वस्तर पर नैतिक, व्यवहारिक, रोज़गारपरक, परिणाम उन्मुख, न्यायकारक, प्रायोगिक, यातायात क्षेत्र के सुधारों के साथ सभी के स्वास्थ्य को उत्तम रखनेवाली शिक्षा प्रणाली की जरुरत है. इसके साथ साथ विश्व शान्ति का निर्माण होगा. आज विश्व में नैतिक और व्यवहारिक शिक्षा नहीं मिलने से विश्वयुद्ध, हिंसा का वातावरण बना हुआ है.
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