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वसंत मुंडे : जिन्होंने अखबारों को आर्थिक आत्मनिर्भरता की राह दिखाई

(महाराष्ट्र राज्य पत्रकार संघ के प्रदेश अध्यक्ष वसंत मुंडे के जन्मदिन पर विशेष)

- डॉ. प्रभू गोरे, औरंगाबाद

पत्रकारिता आम जनता की आवाज को सरकार तक पहुंचाने का माध्यम है। यही जानकर वसंत मुंडे नाम का युवक पत्रकारिता में आया और आम लोगों के सवाल उठाते हुए अखबारों और पत्रकारों के भी सवाल उठाने लगा! पढ़कर हैरानी हो सकती है, लेकिन वसंत मुंडे ने सोलह साल की उम्र से ही भ्रष्टाचार के खिलाफ आवाज उठा दी थी। छात्र रहते हुए ग्राम रोजगार गारंटी योजना में मजदूरों की अशिक्षा का फायदा उठाकर सामाजिक वनीकरण कार्य में आर्थिक धोखाधड़ी की गयी। उन्होंने दै. 'लोकमत' के अंबाजोगाई के तत्कालीन पत्रकार मोटेगांवकर सर को मजदूरों के इस भ्रष्टाचार के बारे में बताया और न्याय दिलाया।

बाद में पत्रकारिता की औपचारिक शिक्षा के बाद उन्हें दैनिक लोकसत्ता में जिला प्रतिनिधि के रूप में नियुक्त किया गया और वसंत मुंडे वहां 20 वर्षों से कार्यरत हैं। कलम के माध्यम से वंचित और उपेक्षित तबकों के लिए काम करने वाली कई संस्थाओं को आर्थिक मदद पहुंचाई। उन्होंने कृषि और शिक्षा के विषयों पर काफी सकारात्मक और ऊर्जावान लेख लिखे। 

इसी कारण से तत्कालीन प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह द्वारा आमंत्रित चुनिंदा पचास पत्रकारों की नेशनल कांफ्रेंस में भी श्री. मुंडे निर्वाचित हुए थे। गन्ना मजदूरों के साथ रहते हुए लिखी लेखमालिका 'समर्थ' ने उन्हें को छात्रवृत्ति दिलाई। इसके अलावा भी कई अवॉर्ड मिले। अच्छा संवाद और किसी विषय को बिना समझौता किए चंद शब्दों में प्रस्तुत करने की क्षमता उनकी विशेषता है।

⦿ सवाल पूछे, रास्ता बताया
आम लोगों के सवालों को कलम से उठाते हुए साथी पत्रकारों के सवालों को भी महसूस किया. समाज की समस्याओं को सामने रखने वालों की समस्याओं पर अक्सर आंखें मूंद ली जाती हैं। शासकों और समाज को भी नहीं लगता कि पत्रकारों के पास कोई सवाल है। मुंडे ने इस बात को महसूस करने के बाद पत्रकारों के संघ के माध्यम से पत्रकारों और संपादकों के सवाल उठाए और उन्हें हल करने के तरीके भी सुझाए। 

औरंगाबाद संभागीय अधिस्वीकृति समिति के अध्यक्ष बनने के बाद मुंडे ने महाराष्ट्र में पहली बार प्रत्येक जिले में सरकारी समिति के पत्रकारों के साथ सीधे खुला परिचर्चा कार्यक्रम किया. इससे दमनकारी शर्तों में ढील दी गई और स्वीकृति पत्र प्राप्त करने की राह आसान हो गई। तत्कालीन मुख्यमंत्री देवेंद्र फडणवीस ने इस पर ध्यान दिया क्योंकि शहर से लेकर ग्रामीण स्तर तक के पत्रकारों के सवाल हल किए जा रहे थे।

⦿ संपादक न होते हुए भी बने अध्यक्ष
वसंत मुंडे को सर्वसम्मति से महाराष्ट्र राज्य मराठी पत्रकार संघ (मुंबई) का प्रदेश अध्यक्ष चुना गया। संस्था के इतिहास में ऐसा पहली बार हुआ है कि जो संपादक नहीं है ऐसे पत्रकार को अध्यक्ष चुना गया है। अध्यक्ष का पदभार ग्रहण करने के बाद उन्होंने तेरह हजार से अधिक पत्रकार सदस्यों वाली संस्था के कार्य को जनोन्मुख बनाने के लिए आधुनिक तरीकों का प्रयोग किया।

⦿ आत्मनिर्भरता पर संपादकों का गोलमेज सम्मेलन
सोशल मीडिया के बढ़ते प्रभाव से संकट में पड़ा अखबार कारोबार कोरोना की वजह से और मुश्किल हो गया है। विज्ञापनों का प्रवाह कम होने से चेन अखबारों समेत छोटे अखबारों का आर्थिक हिसाब बिगड़ गया है। उत्पादन लागत के तीस प्रतिशत पर अखबारों की होम डिलीवरी की पारंपरिक नीति, कोरोना, ऑनलाइन पढ़ने की आदत से आर्थिक संकट पैदा हो गया और कार्यरत पत्रकारों को वेतन कटौती का सामना करना पड़ा। बहुत से लोगों को नौकरी भी गँवानी पड़ी।
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मीडिया की अर्थनीति पुनः परिभाषित करने वाला नेतृत्व

- संतोष कानडे, बीड़ (महाराष्ट्र)
बीड़ यह सिर्फ गन्ना मजदूरों या बेरोजगारों का जिला नहीं है, बल्कि नेतृत्व करने वालों का जिला है। इस मिट्टी में नेतृत्व के बीज जन्म से ही हैं ऐसा प्रतीत होता है। 'अध्ययन करके दुनिया के सामने आने' का व्रत लेकर चलने वालों की संख्या कम ही सही लेकिन निश्चित है।

बीड पत्रकारों का भी जिला है। यहां बहुत सारे पत्रकार रोजगार की तलाश में हैं, न्याय के तलबगार हैं और अपना नाम बनाने की कोशीश में हैं। ये सब पहले खुद से और फिर व्यवस्था से लड़ रहे हैं। यह लड़ाई एक जमाने में व्यर्थ और बिना सूत्र की थी। वसंत मुंडे ने इन संघर्षों को एक सूत्र में बांधा।

करीब बीस साल पहले पत्रकारिता में आए वसंत मुंडे का नाम पूरे प्रदेश में पहुंच गया है। यह नाम पत्रकारों के प्रश्न और उन्हें सुलझाने की कला की वजह से है। 'कला' शब्द इसलिए लिखा है कि केवल इच्छा होने से या समय देने से काम नहीं होता है। 

जागरूकता पैदा करने और समस्याओं को हल करने के लिए एक व्यक्ति को कौशल की आवश्यकता होती है। वह वसंतजी मुंडे में है। उन्होंने अब यह साबित कर दिया है कि अगर आपका 'बेसिक' पक्का है तो छोटे उपाय भी बड़े कारगर हो सकते हैं। राजनीतिक संगठन उतने तकलीफ देने वाले नहीं होते जितने पत्रकारों के संगठन होते हैं। क्योंकि पत्रकार हमेशा सवाल उठाने और उंगली उठाने की भूमिका में होते हैं।

प्रश्न जानकर संघर्ष की योजनाः
वसंत मुंडे ने महाराष्ट्र राज्य मराठी पत्रकार संघ के माध्यम से जिलाध्यक्ष पद से कार्य आरंभ किया। बाद में, वे मराठवाड़ा अध्यक्ष, राज्य कार्यकारी अध्यक्ष और अब राज्य सरकार अधिस्वीकृति समिति के क्षेत्रीय अध्यक्ष हैं। इसी के जरिए पत्रकारों के सवाल उनके समझ में आए और लड़ाई शुरू हो गई। पत्रकारों की मानसिक स्थिरता से लेकर आर्थिक स्थिरता तक की उनकी लड़ाई सफलता की राह पर है। वह भी प्रदेश के प्रमुख दैनिक लोकसत्ता में काम करते हुए।

यह समय ऐसा है कि किसी को विश्वास नहीं होता कि पत्रकारों की समस्याएं होती हैं, दैनिकों की भी समस्या हो सकती हैं या पत्रकारिता में अस्थिरता आदि हो सकती है। यह इसलिए एक धारणा है कि लड़ाई, न्याय, अन्याय, सवाल, मांग... इन शब्दों का इस्तेमाल सिर्फ खबरों में होता है। दूसरों को छोड़िए लेकिन पत्रकारों का भी यही हाल है। जैसे दीए तले अंधेरा हो। 

लेकिन अगर किसी ने इस बात पर जोर दिया है कि 'पत्रकारों की भी समस्याएं हैं और उनका समाधान होना चाहिए', तो वे वसंत मुंडे हैं। पत्रकार खुद भूखा हो तो दूसरे का क्या भला करेगा? यह सीधा-साधा गणित है। लेकिन किसी के गले नहीं उतर रहा था। क्या अन्याय के साये में जीने वाला दूसरों को न्याय दे सकता है? 

क्या उसके प्रयास वास्तव में ईमानदार होंगे? यह असली सवाल पूछने की धमकी मुंडेजी में है। आज स्थिति बदल रही है। पत्रकार, छोटे-छोटे अखबार, मीडिया हाउस जागरूक हो रहे हैं, पत्रकारिता के अर्थशास्त्र का पहिया रफ्तार पकड़ने वाला है. वसंत मुंडे के प्रयास सराहनीय हैं और निश्चित रूप से फल देंगे।


सबको साथ लेकर चलने वाला सक्षम नेतृत्वः
हर क्षेत्र में संगठन होता है। नेता होते हैं। राजनीति विज्ञान की कसौटी के अनुसार नेतृत्व का एक पैर संगठन की ओर और दूसरा प्रगति की ओर उठना चाहिए। तभी वह संस्था, वह समाज उन्नति कर सकता है। दोनों पैर समाज में या संगठन में हो तो नहीं चलेगा। या फिर दोनों पैरों का विकास की दिशा में चलना भी ठिक नहीं। साथ लेकर चलने की अवधारणा सक्षम नेतृत्व की जिम्मेदारी बताने वाली है। वसंत मुंडे का नेतृत्व उतना ही कुशल है। इसलिए वे छोटे अखबारों के पत्रकारों की समस्याएं लेकर मुंबई-दिल्ली के चक्कर लगाते हैं। 

क्या होते हैं पत्रकारों के प्रश्न? अपर्याप्त पारिश्रमिक, काम के घंटे तय न होना, अनिर्धारित भोजन का समय, स्वास्थ्य सुरक्षा की कोई गारंटी नहीं और पर्याप्त छुट्टियां नहीं। न पैसा है और न परिवार के लिए समय। इस तरह की दुविधा में फंसे पत्रकारों के लिए क्या किया जा सकता है, इसके लिए उनके चल रहे प्रयासों को देखकर उनका प्रयोगात्मक नेतृत्व सिद्ध होता है।
अधिस्वीकृति समिति का क्षेत्रीय अध्यक्ष बनने के बाद मुंडे ने खुली चर्चा का प्रयोग किया। 

पत्रकारिता के इतिहास में ऐसा प्रयोग आज तक किसी ने नहीं किया। वे राज्य के कई शहरों में गए और वहां पत्रकारों से सीधे संवाद किया। आपके प्रश्न क्या हैं? अधिस्वीकृति प्रमाणपत्र प्राप्त करने में क्या कठिनाइयाँ हैं या दमनकारी नियम क्या हैं? 

उन्होंने यह पता लगाने के लिए संघर्ष करना शुरू किया कि पत्रकार कैसे आसानी से मान्यता प्राप्त कर सकते हैं और इससे अधिकतम लाभ प्राप्त कर सकते हैं। उसमें वह सफल भी रहे। उनके कार्यकाल के दौरान वरिष्ठ पत्रकारों को अधिक से अधिक अधिस्वीकृति पत्र मिले। 

महत्वपूर्ण यह है कि, मुंडे ने अधिस्वीकृति पत्रों के लिए दैनिकों का कोटा बढ़ाने में बहुत योगदान दिया। अत: तालुका स्तर पर कार्यरत पत्रकारों एवं मुख्यालय स्तर पर कार्यरत पत्रकारों को अतिरिक्त 'अधिस्वीकृति' प्राप्त हुई। बेशक, यह सब प्रश्न को समझकर हासिल किया गया था। इसलिए मराठवाड़ा और राज्य के पत्रकार मुंडे के नेतृत्व पर अड़े हुए हैं।


आर्थिक सुधार के लिए ब्लू-प्रिंटः
अगर हम वास्तव में यह समझना चाहते हैं कि मुंडे ने पत्रकारों के लिए क्या काम किया, तो हमें उनके द्वारा प्रस्तुत 'अर्थशास्त्र' या 'नीति' को समझना होगा। तब जाकर मुंडे के ब्लू-प्रिंट को सही मायनों में समझने में मदद मिलेगी।

सोशल मीडिया और डिजिटल पत्रकारिता के कारण छोटे-छोटे दैनिक अखबार बंद हो गए हैं। इसमें दो साल का कोरोना का साया था। इससे बेरोजगारी की कुल्हाड़ी पूरे मीडिया जगत पर गिरी। 

मीडिया घरानों ने बिना किसी कानूनी बंदिश के कर्मचारियों की छंटनी की। छोटे दैनिक समाचार पत्र पूरी तरह से ढह गए। पारिश्रमिक पर काम करने वाले जिला व तालुक के पत्रकार बेहद बेचैन हो गए। 

ऐसी स्थिति में वसंत मुंडे चुप कैसे रह सकते थे? लॉकडाउन के दौरान महाराष्ट्र राज्य मराठी पत्रकार संघ के माध्यम से विभिन्न पत्रकारिता गतिविधियां शुरू की गई। पत्रकारों का हौसला बढ़ाया। लेकिन मीडिया की दुनिया बनाने के लिए एक स्थायी समाधान की जरूरत थी। 

मुंडे ने 2020-21 के आसपास दैनिक समाचार पत्रों की कीमतों में वृद्धि के संबंध में एक नया विचार प्रस्तावित किया। सभी ने इसे चौंक कर देखा और अपनी भौहें ऊपर उठा लीं। कीमतें कैसे बढ़ेंगी?, क्या लोग पेपर खरीदेंगे? इससे क्या हासिल होगा? इस तरह के सवाल आने लगे। 

इस अवधि के दौरान उन्होंने बैठकों और संचार पर जोर दिया। उन्होंने अपनी बात सरल रखी। वह उन्हें मनाने के लिए घंटों बात करते थे। बाजार में प्रत्येक उत्पाद का अपना मूल्य होता है, जिसे निर्धारित करने का अधिकार निर्माता के पास होता है। 

कच्चे माल की लागत, जनशक्ति, बिजली, परिवहन, वितरण, इन सभी लागतों को समझ कर फिर उत्पाद का मूल्य निर्धारित करना होता है। ये है बाजार का गणित। लेकिन समाचार पत्र क्षेत्र इससे बेखबर था। मीडिया को अपने मेल्य का कोई एहसास नहीं था। चार पन्ने के एक अंक की कीमत बीस से तीस रुपए, आठ पन्ने के रोज की कीमत पचास-साठ रुपए के आसपास होती है। 

फिर रोज की कीमत 2-5 रुपए ही क्यों, यही अहम सवाल है। वसंत मुंडे ने इस पर जोर दिया और सारांश प्रस्तुत करना शुरू किया कि 'आहिस्ता-आहिस्ता कीमतें बढ़ाओ, दैनिक खर्च कम होगा तो वित्तीय साक्षरता हासिल होगी'। उसमें वह सफल भी रहे। 

राज्य में लगभग 150 से 200 दैनिकों ने कीमतें बढ़ाने का फैसला किया और ऐसा किया भी। दिलचस्प बात यह है कि किसी भी दैनिक खपत पर प्रतिकूल प्रभाव नहीं पड़ा है। किसी के अंक कम नहीं किए गए या किसी पाठक द्वारा साधारण सी शिकायत भी नहीं की गई। दैनिक अखबार बहुत सहजता से सक्षम होने लगे।

यह अभियान ही शुरू हो गया है। यह अभियान अब पूरे राज्य में फैलने की कोशिश कर रहा है। एक छोटा सा उपाय बहुत ही कारगर साबित हुआ।
दैनिक समाचार पत्र मजबूत खड़ा होगा तो पत्रकारिता बचेगी, यही मूल सूत्र है। इतना ही नहीं उन्होंने दिल्ली तक आवाज बुलंद की। 

जिस कार्यालय में दैनिक का पंजीकरण होता है वहां उन्होंने 'आरएनआई' के अधिकारियों को भी दैनिक की कीमत के बारे में समझाया। तब अधिकारी भी आश्चर्यचकित हुए। अब मुंडे ने इस संबंध में अलग से प्रशासनिक या न्यायिक लड़ाई छेड़ दी है। एक बार यह 'रजिस्ट्रार कार्यालय' दैनिक समाचार पत्रों के मूल्य पर एक आधिकारिक निर्णय ले लेता है, तो मीडिया जगत को राख से उठने में देर नहीं लगेगी।

साप्ताहिक अवकाश लें
वसंत मुंडे की अगली बात हैरान करने वाली है। साप्ताहिक अवकाश। 'अख़बार में कोई छुट्टी होती है क्या? छुट्टी छोड़ कर बात करो ऐसी 'प्रतिक्रियाएँ थीं। यहां भी मुंडे ने उसके पीछे का जो अर्थशास्त्र और स्वास्थ्यशास्त्र है उसे मनवा लिया। 

'एक दैनिक को छापने और उसे पाठकों के दरवाजे तक पहुंचाने में कितना खर्च आता है? एक दिन का कितना खर्चा आता है? एक महीने में चार दिन और एक साल में 48 दिन की लागत क्या है? ऐसा कोई नियम नहीं है कि दैनिकों में साप्ताहिक अवकाश न हो। एक तो लागत बचाता है और दूसरा कर्मचारियों को खुश रखता है। 

आज सरकार ने पांच दिन का सप्ताह बना दिया है। कई निजी कंपनियों और कॉर्पोरेट समाचार क्षेत्र में भी पाँच दिन का सप्ताह होता है। तो छोटे दैनिकों और पत्रकारों ने क्या किया? इसके विपरीत, छुट्टी के कारण पत्रकार अधिक ऊर्जा के साथ काम कर पाएगा!' 

राज्य के कई दैनिक समाचार पत्रों ने भी इस मुद्दे को गंभीरता से लिया है। कुछ ने इसके बारे में सोचते हुए छुट्टियां भी शुरू कर दीं। इस फैसले से पत्रकारिता के प्रति अपनापन और आकर्षण पैदा करने में मदद मिलेगी। इसके साथ ही मुंडे ने पत्रकार पेंशन और पत्रकार संरक्षण अधिनियम में बहुत योगदान दिया है।

वसंत मुंडे की मांग है कि केंद्र सरकार जिला दैनिक, लघु संभागीय दैनिक को लघु उद्योग में शामिल करे। इसके लिए उनकी केंद्रीय लघु, सूक्ष्म और मध्यम उद्योग मंत्री नारायण राणे से बातचीत चल रही है। 

दैनिक समाचार पत्रों को लघु उद्योग का दर्जा मिलने पर वे उस उद्योग मंडल के अंतर्गत आएंगे। एमआईडीसी क्षेत्रों में प्रिंटिंग मशीन, कर रियायत और प्रिंटिंग प्रेस के लिए जगह के लिए ऋण उपलब्ध हो सकता है। साथ ही उम्मीद है कि बजट में इस व्यवसाय के लिए प्रावधान किया जाएगा। निश्चित तौर पर अख़बार मज़बूती से खड़े होंगे। जनता की आवाज और बुलंद होगी। लेकिन इसके लिए राजनीतिक इच्छाशक्ति की जरूरत है। बहरहाल, मुंडे का ईमानदार प्रयास जारी है।

समाचार पत्रों के पाठकों को टैक्स में राहतः
एक और महत्वपूर्ण मुद्दा है। जिससे दैनिक की खपत बढ़ सकती है। साथ ही अच्छे लेखन को आर्थिक सहयोग मिलेगा। यह मुद्दा है समाचार पत्रों की खरीद पर ग्राहक को कर कटौती मिलनी चाहिए। 

किसी पाठक ने साल भर अखबार खरीदा तो उसे इन्कम टैक्स रिटर्न में पांच हजार रुपयों की रियायत मिले इस मांग को लेकर केंद्रीय वित्त राज्य मंत्री डॉ. भागवत कराड से वसंत मुंडे ने कई बार मुलाकात की। विचार-विमर्श हो रहा है। अगर सरकार इस फैसले को गंभीरता से लेती है तो दैनिक अखबार मजबूती से खड़े रहेंगे। कम से कम टैक्स छूट से घर में अखबार पढ़ने की परंपरा को बढ़ाने में मदद मिलेगी। अच्छे लेखक आगे आएंगे। 

पत्रकार एक अध्ययनपूर्ण प्रस्तुति देने के लिए बाध्य होंगे। ये सभी उपलब्धियां सिद्ध की जा सकती हैं। केंद्र सरकार ने अगर तय किया, अगर अच्छे फैसले लिए गए तो दैनिक अखबारों के वीरान महलों के लिए मजबूत दीवारें और छत मिल सकती है। वसंत मुंडे इसके लिए प्रयासरत हैं।

संघर्षशील नेतृत्वः
वसंत मुंडे एक योद्धा हैं जो पत्रकारों के लिए लड़ते हैं। यह एक उदाहरण है कि पत्रकारों का नेतृत्व क्या कर सकता है। सभी पत्रकारों को ईमानदारी से समर्थन देकर वसंत मुंडे का हाथ मजबूत करने की जरूरत है। 

पत्रकारिता का चेहरा बदले बिना व्यवस्था का चेहरा नहीं बदलेगा। उसके लिए पत्रकार; जिसे चौथा स्तंभ कहते हैं, उसका मजबूत होना जरूरी है। अधिस्वीकृति पत्र मिलने में आसानी, दैनिक समाचार पत्रों की कीमतों में वृद्धि, साप्ताहिक अवकाश, पाठकों को टैक्स रियायतें, दैनिकों को लघु उद्योग का दर्जा, पत्रकारों को अच्छा पारिश्रमिक; वसंत मुंडे इन सभी मोर्चों पर काम कर रहे हैं, इसमें कोई शक नहीं कि उनका काम एक दिन नया इतिहास रचेगा।
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द्वार पर खिली वसंत ऋतु

- सुधीर कोर्टीकर, औरंगाबाद
यह सच है कि मैंने वसंत मुंडे के बारे में लिखने के लिए कलम उठाई है, लेकिन डाॅ. प्रभू गोरे के साथ वसंत के जुड़ाव की अनंत यादों से मेरा मन सुख से डोल रहा है। डाॅ. प्रभु गोरे के सान्निध्य में वसंत मुंडे के रूप में एक पत्रकार मित्र मुझे मिला है। यह खुशी शब्दों से परे है। 

वसंत मुंडे जिन्हें अभिजात पत्रकारिता का वरदान मिला है... मुझे लगता है कि मेरे शब्द उनकी सराहना के लिए पर्याप्त नहीं हैं...
"कितना ले सकते हो तुम दो हाथों से...?" यह कहते हुए भगवान श्री पांडुरंग ने इस वसंत की अंजुली में बुद्धिमत्ता का भरपूर वरदान दिया है। पत्रकारों के लिए...महाराष्ट्र के संपादकों के लिए, बीड के एक छोटे से गाँव से एक ऐसे योद्धा का उदय हुआ जो एक अच्छे उद्देश्य के लिए लड़ने वाला और बुद्धिमत्ता का तेजस्वी रूप लेकर आया है।

छात्र अवस्था में ही वसंत ने अपनी तेजस्विता की झलक दिखायी। सामाजिक वनीकरण के काम पर मजदूरों से आर्थिक धोखाधड़ी करने वालों को वसंत मुंडे ने अंबाजोगाई के पत्रकारों की मदद से न्याय दिलाया।

अपने लेखन से अनगिनत पत्रकारों की समस्या को सुलझाया। बीड़ जिले के वंचित तथा उपेक्षित वर्ग के लिए काम करनेवाली सामाजिक संस्थाओं को भी बड़ी आर्थिक सहायता दिलाने का अनमोल कार्य वसंत मुंडे इन्होंने किया है। वसंत के जीवन में उनके द्वारा संकल्पित सारे सपने साकार हो रहे थे। किसी अखबार के संपादक ना होते हुए भी महाराष्ट्र राज्य पत्रकार संघ के अध्यक्षपद की माला उनके गले में सार्वमत से पहनाई गयी। यह तो वसंत मुंडे ने किए कार्यों का फल था।

बीड़ के पास एक छोटे से गाँव से आए हुए इस तेजस्वी, तेजतर्रार युवक ने अपनी अमोघ, प्रवाही वाणी से सभी को अपना बना लिया। वसंत मुंडे ने अपनी भाषाशैली से, शब्दों की सुंदरता से और हृदय तक पहुँचने वाले लेखन से मराठवाड़ा ही नहीं बल्कि मुंबई के मान्यवरों के हृदय में भी अपना अलग स्थान बनाया था। इसका प्रमाण तब सभी को मिला जब उन्होंने संपादकों की गोलमेज परिषद का आयोजन किया था।

वसंत मुंडे यह महाराष्ट्र की पत्रकारिता क्षेत्र का एक चमकता हुआ स्वयंप्रकाशी सितारा है। उनके अलौकिक गुण, कर्तृत्व, दातृत्व, नेतृत्व और वक्तृत्व के द्वारा वसंत मुंडे एक बहुमुखी नेतृत्व के तौर पर सभी को परिचित हुए।

वसंत मुंडे इनका किसी भी विषय का अध्ययन और उस पर लेखन अद्वितीय होता है। उनका वाक्चातुर्य, भाषण का शब्दसौंदर्य और मधुरता अनोखी होती है। वसंत मुंडे जैसे शब्दप्रभू के शब्द जब काव्यरस उंडेलते हैं तब उनके अंतरंग के भावतरंग बिल्कुल पारदर्शिता से हर शब्द के द्वारा शुद्ध सौंदर्य व्यक्त करते हैं।

तब उनके शब्दों के अर्थ खोजते हुए अपने शब्द भी कम पड़ जाते हैं। क्योंकि वसंत के द्वारा लिखा हर शब्द पाठक के मन छू लेता है। तब हम सभी पर जो उनका प्रेम है उसे व्यक्त करने के लिए उनके शब्द भी मौन हो जाते हैं। उनके लेखन का आशय पढ़ते हुए हमें कहना पड़ता है की, "बिना शब्दों के समझ गए हम शब्दों से जो परे है...।"

वसंत मुंडे यह सचमुच ईश्वर का बनाया हुआ अलौकिक व्यक्तित्व है। पिछले दो वर्षों में कोरोना के कारण अखबारों की दुनिया में कई तूफान आए। छोटे अखबारों की नैया तो इस तूफान में किनारे तक पहुँच ही नहीं सकी। सभी अखबार वित्तीय संकट में घिर गए। वेतन में कटौती हुई और कईयों को तो नौकरी गँवानी पड़ी।

इन आपत्तियों का धैर्य से मुकाबला करते हुए सभी को आत्मनिर्भर होकर सामना करने की राह वसंत मुंडे इन्होंने बताई... एक दीपस्तंभ की तरह। इसी कारण से उनके कर्तृत्व को एक सुनहरा पहलू प्राप्त हुआ यह भी सत्य है।

वसंत मुंडे यानि अमृत जैसे रसिले फलों से लदा हुआ एक सदाबहार और सभी को सुख की छाँव देने वाला एक सुंदर वृक्ष है। प्रेमरस के, अपनेपन के अनगिनत मीठे फल उन्होंने अत्यंत भावपूर्ण होकर उनके साथियों को दिए। जिन्हें ये फल मिले उनका जीवन आनंदमय, सुखमय, सुजल, सुफल हो गया है।

वसंत मुंडे जैसा एक अलौकिक व्यक्तित्व मित्र के रूप में ईश्वर ने दिया है। उस भगवान पांडुरंग का उपकार व्यक्त करने के लिए मेरे शब्द अधूरे हैं ऐसा ही मुझे लगता है।

वसंत मुंडे के साथ बिताए पलों की यादें मेरे हृदय की स्मृति सींप में किसी मोति जैसी सहेजी हुई हैं। वसंत ने उनके साथियों को अंजुली भर-भरकर सुसंस्कार के फूल दिए।
आज वे फूल भले ही सूख गए हो, लेकिन उनकी सुगंध आज भी कायम है। उसी सुगंध से उनका जीवन खिलने वाला है।

वसंत मुंडे इनकी कलम के शब्द सौंदर्य के बारे में ज्यादा क्या लिखें! पढ़ने वाला भावुक हो जाता है। सरस्वती देवी का वरदहस्त उनके मस्तक पर है ऐसा ही लगता है। एक दीपस्तंभ की तरह वसंत मुंडे इन्होंने अनगिनत लोगों को उनके जीवन की दिशा बताई।

ऐसे ज्ञानसंपन्न, गुणसंपन्न, अलौकिक व्यक्तित्व के बारे में क्या और कितना लिखे! ऐसी मेरी भावदशा हुई है। वसंत मुंडे के बारे में यही कहूँगा की उन्होंने सभी को पिता का स्नेह दिया, प्रेम की छाया दी, संतोष का स्पर्श दिया, सुख का हर्ष दिया।
ऐसे चहुमुखी व्यक्तित्व के बारे में कितना भी लिखे तो वह कम है ऐसा ही मुझे लगता है।
अंत में यही कहना चाहूँगा कि

जल बिना मीन कैसे
सुर बिना स्वर मंदिर कैसा
वसंत मुंडे बिना

पत्रकारिता का जीवन कैसा!

वसंत मुंडे ने अनगिनत लोगोंं की अनमोल सहायता की। इस मदद के माध्यम से हमारे वसंत ने हर एक द्वार पर सही अर्थों में ऋतु वसंत को खिलाया है। ऐसे मेरे इस परममित्र को जन्मदिन के उपलक्ष्य में मेरी यह शब्दांजली अर्पण करता हूँ। वसंत ने अपने जीवन में संकल्पित सारे सपने साकार हो यही ईश्वर से प्रार्थना करता हूँ और मेरे शब्दों को विराम देता हूँ।
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जिगरी दोस्ती का अनोखा दर्शन

नागपुर/बीड। केंद्रीय वित्त राज्य मंत्री डॉ. भागवत कराड तथा सहकारिता मंत्री अतुल सावे, बीड यात्रा के दौरान, उनके पुराने मित्र पत्रकार वसंत मुंडे के कार्यालय गए। शुरुआती दिनों की यादों को ताजा करते हुए मुक्त संवाद शुरू हुआ और जिगरी दोस्तों की महफील जमी। 

इस समय मुंडे, कराड और सावे के बीच हृदयपूर्वक मित्रता का अनुभव हुआ। सार्वजनिक जीवन में हाल ही में तीक्ष्ण भूमिकाएँ और राजनीति में कुछ ऊँचाइयों तक पहुँचने के बाद व्यक्तिगत मित्रता को सँभालकर रखना एक अपवाद है। लेकिन वह दिखाई दिया। 

बीड में शनिवार 10 दिसंबर को केंद्रीय वित्त राज्य मंत्री  डॉ. भागवत कराड, सहकारिता मंत्री अतुल सावे आए थे। कार्यक्रम के बाद दोनों ने महाराष्ट्र राज्य मराठी पत्रकार संघ के प्रदेश अध्यक्ष वसंत मुंडे के कार्यालय को भेंट दी। पिछले बीस वर्षों में वसंत मुंडे ने अपनी उपलब्धियों से पत्रकारिता के क्षेत्र में एक अलग छाप छोड़ी है। तो डॉ. कराड, सावे ने भी राजनीतिक क्षेत्र में विशेष ऊंचाइयां हासिल की हैं।  

जिस समय कराड और सावे ने राजनीतिक कैरियर का आरंभ तभी वसंत मुंडे ने भी अपनी पत्रकारिता शुरू की थी। भले ही वसंत मुंडे बीड में एक पत्रकार के रूप में काम कर रहे थे, लेकिन वे शुरू से ही संगठन के माध्यम से पत्रकारों से संपर्क में रहे हैं। 

स्वर्गीय गोपीनाथ मुंडे, विलासराव देशमुख सहित राज्य भर में पत्रकारिता के क्षेत्र में प्रसिद्ध लोगों के संपर्क में आने के बाद, अक्सर यह देखा गया कि उन्होंने पत्रकारिता से परे जाकर दोस्ती का एक मजबूत धागा बनाया। 

संयोग से, हालांकि कराड, सावे और मुंडे अपने-अपने क्षेत्र में एक निश्चित ऊंचाई पर पहुंच गए थे, बीड़ के लोगों ने महसूस किया कि तीनों ने अपनी व्यक्तिगत मित्रता को प्रभावित किए बिना अपने रिश्ते को बनाए रखा। जैसा कि सार्वजनिक जीवन में राजनीतिक भूमिकाएं हाल ही में अधिक चरम हो गई है, व्यक्तिगत स्तर पर सहजता कम हो गई है ऐसा दिखाई दे रहा है।

लेकिन राजनीतिक क्षेत्र में एक निश्चित ऊंचाई पर पहुंचने के बाद व्यस्त कार्यक्रम के कारण नेताओं के दौरे जल्दबाजी में होते हैं। इसलिए, चाह कर भी मित्रों से मिलना और दिल का रिश्ता विकसित करना संभव नहीं है। ऐसे में मुंडे, कराड और सावे की मुलाकात ने सार्वजनिक भूमिकाओं से परे सौहार्दपूर्ण मित्रता का भावपूर्ण दर्शन कराया। 

अखबारों के अर्थशास्त्र पर वसंत मुंडे द्वारा बारीकी से किए गए अध्ययन की बुकलेट केंद्रीय वित्त राज्य मंत्री कराड और सहकारिता मंत्री को दी गई। उस वक्त दोनों ने पत्रकारिता के क्षेत्र में वसंत मुंडे के काम की सराहना की। इस अवसर पर संपादक संतोष मानुरकर उपस्थित थे।

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