राष्ट्रीय शिक्षा नीति के लिए भारतीय भाषाओं की आवश्यकता - मनाली क्षीरसागर
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भारतीय भाषाओं की शब्द संपदा को आधार बनाकर ही राष्ट्रीय शिक्षा नीति के लक्ष्य को प्राप्त किया जा सकता है। हमारी परंपरा में अनेक शब्द हैं जिनका प्रयोग न होने के कारण वह विस्मृत हो गए हैं। आवश्यकता है ऐसे शब्दों के खोज की जिनसे भाषाएं भी समृद्ध हों और शिक्षा का भारतीय स्वरूप भी स्पष्ट हो सके। यह बात राष्ट्रसंत तुकडोजी महाराज नागपुर विश्वविद्यालय की कुलगुरु प्रो. मनाली क्षीरसागर ने कही। वे विश्वविद्यालय के हिंदी विभाग और भारतीय भाषा समिति, नई दिल्ली के संयुक्त तत्वावधान में आयोजित दो दिवसीय राष्ट्रीय कार्यशाला को संबोधित कर रही थीं। कार्यशाला का विषय था - भारतीय भाषाओं की समान शब्दावली : हिंदी और मराठी भाषा के विशेष संदर्भ में'। उन्होंने हिंदी- मराठी शब्दों की समानता का कारण दोनों की समान लिपि को बताया। उन्होंने कहा कि दोनों ही भाषाएं व्युत्पत्ति की दृष्टि से समान हैं। इस नाते इनके शब्दों में बहुत समानता है।
प्रमुख अतिथि के रूप में बोलते हुए भारतीय भाषा समिति के सलाहकार प्रो. सर्राजू ने कहा कि हमें मौलिक शब्दों के निर्माण पर विचार करने की आवश्यकता है। शब्द निर्माण की हमारी पद्धति बहुत प्रामाणिक और वैज्ञानिक रही है उस पर पुनः विचार करने की जरूरत है। अपनी शब्द संपदा में नए शब्द निर्मित करके ही हम लिप्यंतरण और अनुवाद से बच सकते हैं। अपने यहां शब्द को ब्रह्म माना गया है। प्रो. रघुवीर ने उपसर्ग, प्रत्यय जैसे अनेक पक्षों पर विचार करते हुए एक प्रामाणिक दृष्टि प्रस्तुत की थी। प्रो. सर्राजू ने हिन्दी -मराठी की प्रकृति के अनुरूप नये शब्दों को बनाने पर बल दिया। विशिष्ट अतिथि प्रो. अवधेश कुमार , महात्मा गांधी अंतरराष्ट्रीय हिंदी विश्वविद्यालय, वर्धा ने सभी भारतीय भाषाओं की प्रकृतिगत समानता पर चिंतन की अपेक्षा व्यक्त की।
प्रास्ताविक उद्बोधन में हिन्दी विभागाध्यक्ष डॉ. मनोज पाण्डेय ने कार्यशाला की संकल्पना स्पष्ट करते हुए कहा कि भारतीय भाषाओं की समान शब्दावली भारतीय राष्ट्रीय शैक्षिक पाठ्यक्रमों को आधार प्रदान करेगी। हमारी राष्ट्रीय एकता भाषाई बुनियाद पर ही आधारित रही है। कार्यशाला में देश भर से आए हिन्दी, संस्कृत और मराठी भाषा के विशेषज्ञ भाग ले रहे हैं। प्रो. अरिमर्दन कुमार त्रिपाठी,आगरा, प्रो. महेंद्र ठाकुरदास, पुणे, प्रो. कृष्ण कुमार, रामटेक, प्रो. कुबेर कुमावत, अमलनेर, प्रो. भूषण भावे,गोवा, डॉ. शैलेन्द्र लेंडे, डॉ. संजय पल्वेकर, डॉ. विजय कलमधार सहित अनेक विषय विशेषज्ञ और शोधार्थी उपस्थित थे। कार्यशाला का संचालन डॉ. सुमित सिंह ने किया और आभार प्रदर्शन डॉ. कुंजनलाल लिल्हारे ने किया।