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भारतीय ज्ञान चुनौतियों में समाधान देता है : डॉ. मेधा कानेटकर


रातूम नागपुर विद्यापीठ में दो दिवसीय राष्ट्रीय सम्मेलन का आयोजन सम्पन्न

नागपुर। अध्यक्षीय भाषण में कॉमर्स और मैनेजमेंट फैकल्टी की डीन डॉ. मेधा कानेटकर ने पारंपरिक ज्ञान और भारत के सामाजिक ताने-बाने के बीच गहरे संबंध के बारे में बहुत अच्छे से बताया। उन्होंने हेल्थ, एग्रीकल्चर, एनवायरनमेंट और एजुकेशन जैसे ज़रूरी क्षेत्रों में भारतीय ज्ञान की ज़रूरी भूमिका और महत्व पर ज़ोर दिया। सहभागियों से अपनी सांस्कृतिक और बौद्धिक जड़ों से जुड़े रहने की अपील करते हुए डॉ. कानेटकर ने हमारी परंपराओं में छिपी गहरी समझ और सस्टेनेबिलिटी के सिद्धांतों के साथ उनके अंदरूनी तालमेल के बारे में बात की। उन्होंने बताया कि कैसे यह पुराना ज्ञान आज की चुनौतियों के लिए समय के साथ परखे हुए समाधान देता है।


राष्ट्रसंत तुकड़ोजी महाराज नागपुर यूनिवर्सिटी के सोशियोलॉजी डिपार्टमेंट ने एलुमनाई एसोसिएशन ऑफ़ सोशियोलॉजी, जे.एम. पटेल कॉलेज ऑफ़ आर्ट्स, कॉमर्स एंड साइंस, भंडारा तथा अठावले कॉलेज ऑफ़ सोशल वर्क, भंडारा के साथ मिलकर ‘ह्यूमैनिटीज़ और इंडियन नॉलेज सिस्टम’ पर दो दिन का नेशनल कॉन्फ्रेंस सफलतापूर्वक सम्पन्न हुआ। यह कॉन्फ्रेंस, जिसका थीम था 'इंडियन नॉलेज एंड कंटेंपररी सोसाइटी: चेंजिंग कंडीशंस, प्रॉब्लम्स एंड सॉल्यूशंस', 13 और 14 फरवरी को रामनूजन ऑडिटोरियम में हुआ। 
यह कॉन्फ्रेंस सोशियोलॉजी डिपार्टमेंट के हेड डॉ. अशोक बोरकर की दूरदृष्टी थी। जिन्होंने ट्रेडिशनल ज्ञान को मॉडर्न सामाजिक चुनौतियों के साथ जोड़ने पर विचार-विमर्श करने के लिए एक प्लेटफॉर्म की कल्पना की।

यह आयोजन माननीय वाइस चांसलर, डॉ. मनाली क्षीरसागर के मार्गदर्शन में आयोजित किया गया था।  उद्घाटन सत्र में कॉमर्स और मैनेजमेंट फैकल्टी की डीन डॉ. मेधा कानेटकर चेयरपर्सन और उद्घाटनकर्ता के तौर पर मौजूद थीं। सोशियोलॉजी डिपार्टमेंट के हेड (इन-चार्ज) डॉ. शैलेंद्र लेंडे मुख्य अतिथि के तौर पर इस मौके पर मौजूद थे। ऑर्गनाइजिंग पार्टनर, जे.एम. पटेल कॉलेज, भंडारा के प्रिंसिपल डॉ. प्रदीप मेश्राम तथा समाज कार्य अभ्यास मंडल के अध्यक्ष एवं अठावले कॉलेज ऑफ सोशल वर्क, भंडारा के प्रिंसिपल डॉ. नरेश कोलते, सोशियोलॉजी एलुमनाई एसोसिएशन के वाइस-प्रेसिडेंट डॉ. धनंजय सोनटक्के भी मौजूद थे।

अपने वेलकम एड्रेस में, चीफ गेस्ट डॉ. शैलेंद्र लेंडे ने कॉन्फ्रेंस के मुख्य मकसद बताए। उन्होंने कल्चर और नॉलेज को बनाने में भाषा और लिटरेचर की अहम भूमिका पर ज़ोर दिया। डॉ. लेंडे ने स्टूडेंट्स के पूरे डेवलपमेंट को बढ़ावा देने के लिए नॉलेज को फिर से बनाने की ज़रूरत पर ज़ोर दिया। उन्होंने इंडियन नॉलेज सिस्टम को इंटीग्रेट करके, स्टूडेंट्स में क्रिटिकल और एनालिटिकल सोच पैदा करके, और डिबेट, डायलॉग और डिस्कोर्स के ज़रिए नई प्रेरणा पैदा करके यूनिवर्सिटी को नया आकार देने पर गाइडेंस दिया। उन्होंने मकसद के साथ आगे बढ़ने के लिए आज के ज़माने को समझते हुए और उसके हिसाब से ढलते हुए इंडियन ट्रेडिशन को बचाने की अहमियत पर ज़ोर दिया।

डॉ. धनंजय सोनटक्के ने अपने एड्रेस में एक क्रिटिकल नज़रिया पेश किया, यह देखते हुए कि आज़ादी के बाद, इंडियन कल्चर को अक्सर वेस्टर्न एंथ्रोपोलॉजी के नज़रिए से देखा जाता था। उन्होंने नेशनल एजुकेशन पॉलिसी के फ्रेमवर्क में इंडियन नॉलेज सिस्टम को फिर से स्थापित करने और इंटीग्रेट करने की तुरंत ज़रूरत पर ज़ोर दिया।  डॉ. प्रदीप मेश्राम ने अपने भाषण में, इंडियन नॉलेज सिस्टम को सही मायने में समझने के लिए नॉलेज इंक्वायरी (मीमांसा) को समझने के महत्व के बारे में विस्तार से बताया। उन्होंने ज्ञान की साइंटिफिक जांच की मांग की, जो एंपिरिकल समझ और स्पेक्युलेटिव सोच के बीच अंतर करती हो। 

डॉ. मेश्राम ने आगे इस बात पर ज़ोर दिया कि स्टूडेंट्स को इंसानी ज़िंदगी और समाज पर सोशियोलॉजिकल बातचीत के अंदर जाति, जेंडर, क्लास, भाषा और पेट्रियार्की से जुड़े ज़रूरी सवाल उठाने के लिए बढ़ावा दिया जाना चाहिए। डॉ. नरेश कोलते ने दो दिन के नेशनल कॉन्फ्रेंस के महत्व पर रोशनी डाली और नेशनल एजुकेशन पॉलिसी 2020 के साथ इसके अलाइनमेंट पर ज़ोर दिया, जो इंडियन नॉलेज सिस्टम को बहुत ज़्यादा प्रायोरिटी देती है। उन्होंने कहा कि इस तरह की कॉन्फ्रेंस रिसर्च स्कॉलर्स को बहुत फ़ायदा पहुंचाती हैं।

उद्घाटन सेशन की एक खास बात यह थी कि मंच पर मौजूद जाने-माने लोगों ने कॉन्फ्रेंस की कार्यवाही (जर्नल्स) के दो वॉल्यूम और 'ह्यूमैनिटीज़ एंड इंडियन नॉलेज सिस्टम' की पुस्तक का विमोचन भी किया गया। कॉन्फ्रेंस की एक और खास बात उन स्टूडेंट्स को सम्मानित करना रहा, जिन्होंने 5 फरवरी, 2025 को RTM नागपुर यूनिवर्सिटी के सोशियोलॉजी डिपार्टमेंट द्वारा इंडियन नॉलेज सिस्टम पर एक दिन के स्टूडेंट्स सेमिनार के दौरान पेपर और पोस्टर प्रेजेंटेशन कॉम्पिटिशन में पहला और दूसरा स्थान हासिल किया था। सम्मेलन के दूसरे दिन भी विविध विद्वानों ने अपने विचारों से सम्मेलन कि गरिमा बढ़ाई। 

कॉन्फ्रेंस में 150 से ज़्यादा लोगों ने हिस्सा लिया, जिसमें बड़ी संख्या में प्रोफेसर, रिसर्च स्कॉलर, अभी के और पुराने स्टूडेंट शामिल थे। दो दिन के इस इवेंट ने सोच-समझकर बातचीत करने और भारत के पुराने ज्ञान सिस्टम को आज की सामाजिक समस्याओं के हल के साथ जोड़ने पर बहस करने के लिए एक अच्छा प्लेटफॉर्म दिया। संचालन डॉ. सदफ खान ने किया। आभार प्रदर्शन प्रिंस गणवीर, प्रिवेल सोमकुवर ने किया। 

आयोजन को सफल बनाने में डॉ. चंद्रशेखर मालवीय, डॉ. नंदकिशोर भगत और डॉ. अमोलसिंह रोटाले (पब्लिकेशन टीम) के साथ- साथ सोशियोलॉजी डिपार्टमेंट के फैकल्टी, जिनमें डॉ. पायल चामटकर, डॉ. पूनम निमजे, डॉ. राजश्री कापसे, प्रशंसा खांडेकर, विलास सूर्यवंशी, डॉ. नितिन कयारकर, प्रीवेल सोमकुंवर, प्रिंस गणवीर, तृप्ति गणवीर, कौस्तुभ चुटे, रजत इरपाटे, शिल्पा मेश्राम, रोशनी फुलझेले, किरण शेंडे, अमिता महाताले, विजया नागराडे और डॉ. प्रियंका अम्बादे का सहयोग रहा।
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