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किशोरों में बढ़ती मानसिक स्वास्थ्य समस्या अत्यंत गंभीर


02 मार्च : विश्व किशोर मानसिक स्वास्थ्य दिवस विशेष 

आज के आधुनिक युग में मनुष्य जिस प्रकार से खुद को उन्नत महसूस कर रहा है, उससे ज्यादा खुद को समस्याओं में घिरा पा रहा है, इसमें विशेष है मानसिक स्वास्थ्य समस्या। हर उम्र के लोग कभी न कभी मानसिक स्वास्थ्य समस्याओं से रूबरू होते है या हुए है, सुख-शांति बस नाम की नजर आती हैं। ऐसा लगता है, जैसे हर कोई किसी प्रतियोगिता में शामिल होने के लिए जी रहा हैं। आजकल किशोरवयीन बच्चों में भी मानसिक स्वास्थ्य समस्या का विषय बेहद घातक स्तर पर पहुंच गया हैं। 

किशोरों में लगातार बढ़ता आपराधिक ग्राफ भी गंभीर नजर आता है, इस उम्र के बच्चों में गुस्सा, चिड़चिड़ापन, तनाव, द्वेष, सहनशीलता की कमी, सोशल मीडिया की लत, नशाखोरी जैसी समस्या तेजी से बढ़ी हैं।  हम अक्सर किशोरों द्वारा किये जानेवाले घटनाओं और कृत्यों को जानकर दंग रह जाते है कि, अभिभावकों ने केवल डांटा तो किशोरवयीन बच्चे आत्महत्या या खुद को हानि पहुँचाते, घर से भाग जाना या अनुचित कदम उठाने जैसे अपराध करते है, संगीन अपराधों के लिए बड़े अपराधियों जैसी गैंग बनाकर घूमते हैं। चोरी, डकैती, तस्करी, बलात्कार, खून, जानलेवा हमला करने जैसे गंभीर गुनाहों में भी किशोरवयीन बच्चे लिप्त होने की घटनाएं हैं। स्कूली बच्चों द्वारा अपने शिक्षक पर भी जानलेवा हमले करने की घटनाएं अक्सर सामने आती हैं। कम उम्र में ही गर्लफ्रेंड-बॉयफ्रेंड का चलन, सोशल मीडिया, ऑनलाइन गेमिंग, नशाखोरी, झूठा दिखावा करना, बात-बात पर झूठ बोलना, संस्कारों की कमी, नैतिकताहीन, चरित्रहीनता, अश्लीलता, फूहड़ता ने समाज में जहर घोल दिया हैं। लोगों को आकर्षित करने के लिए मर्यादाओं को लांघकर बेशर्मी का चोला पहनकर अनेक युवा जिंदगी बर्बाद कर चुके हैं।

दूसरी ओर अभिभावकों का अपने बच्चों पर नियंत्रण न होना, बच्चों पर अँधा भरोसा, बच्चों को समय न देना, बच्चों को पोषक वातावरण न देना, बच्चों से बहुत ज्यादा उम्मीदें रखना, प्रतियोगिता का माहौल बनाना, बच्चों पर दबाव डालना या बच्चों की भावनाओं को अभिभावकों द्वारा न समझना, बुरी संगत, बच्चों का जीवन में बुरी बातों या घटनाओं का विरोध करने से डरना, किसी खौफ के साये में जीना भी आजकल किशोरों में मानसिक स्वास्थ्य की वजह हैं। किशोरों में बढ़ती मानसिक स्वास्थ्य समस्या के प्रति जागरूकता हेतु हर साल 2 मार्च को "विश्व किशोर मानसिक स्वास्थ्य दिवस" मनाया जाता है, यह दिवस जागरूकता बढ़ाने, स्टिग्मा को कम करने, चिंता और तनाव, अवसाद जैसी किशोरवयीन स्वास्थ्य चुनौतियों के बारे में खुली बातचीत को बढ़ावा देने और साथ ही स्व:देखभाल नीतियों पर ध्यान केंद्रित करने पर जोर देता हैं। इस साल 2026 की थीम 'किशोरवयीन विद्यार्थियों को उनके स्कूलों में स्वास्थ्यवर्धक कल्याणकारी उपक्रम हेतु नेतृत्व करने के लिए मजबूत बनाना' यह हैं।

विश्व स्वास्थ्य संगठन अनुसार, किशोरवयीन बच्चे शारीरिक, भावनात्मक और सामाजिक बदलावों की वजह से मानसिक स्वास्थ्य समस्या के शिकार हो जाते है, जिसमें गरीबी, गलत व्यवहार या हिंसा शामिल हैं। इन्हें ऐसी समस्याओं से बचाकर बेहतर जीवन के लिए आवश्यक पोषक वातावरण निर्माण कर देना बेहद जरुरी हैं। ऐसा अनुमान है कि, दुनिया भर में, 10-19 साल की उम्र के हर सात में से एक बच्चा मानसिक स्वास्थ्य समस्या का शिकार है, यह दुनिया भर में होने वाली कुल बीमारियों का 15 प्रतिशत है, फिर भी इन समस्या को ज़्यादातर पहचाना नहीं जाता और उनका इलाज नहीं किया जाता। 

ज़िंदगी भर होने वाली सभी मानसिक बीमारियों में से आधी 14 साल की उम्र में शुरू हो जाती हैं। ऐसे मानसिक समस्या वाले बच्चे सामाजिक बहिष्कार, भेदभाव, कलंक पढ़ाई में मुश्किल, जोखिम लेने का व्यवहार, शारीरिक बीमारी और मानवाधिकारों के उल्लंघन के शिकार होते हैं। व्यवहार संबंधी मानसिक विकार बड़े किशोरों की तुलना में छोटे किशोरों में ज़्यादा आम हैं। किशोरवयीन बच्चों में बीमारी और विकलांगता के मुख्य कारण डिप्रेशन, एंग्जायटी और बिहेवियरल डिसऑर्डर हैं। 

15-29 साल के बच्चों में आत्महत्या मौत का तीसरा सबसे बड़ा कारण है। बच्चों को आवश्यक स्वास्थ्य उपचार सुविधा न मिलने के कारण उनके बड़े होने पर उन्हें समाज, परिवार में योग्य स्थान प्राप्त नहीं मिल पाता, जिसके कारण उन्हें जीवन में आगे बढ़ने के लिए अनेक संघर्षों का सामना करना पड़ता हैं। अटेंशन डेफिसिट हाइपरएक्टिविटी डिसऑर्डर, कंडक्ट डिसऑर्डर, बिहेवियरल डिसऑर्डर किशोरों की पढ़ाई पर असर डालकर क्रिमिनल बिहेवियर का खतरा बढ़ा सकते है, जो समस्त मानव समाज के लिए चिंता का विषय होता हैं।
आज के समय में किशोरवयीन बालकों में मानसिक स्वास्थ्य समस्या के लिए अभिभावक सबसे ज्यादा दोषी हैं। बच्चे अभिभावकों की जिम्मेदारी है और अभिभावक यही बात भूल जाते हैं। बच्चों के लाड-प्यार या जिद पूरी करने से ही जिम्मेदारी पूरी नहीं होती हैं। बच्चों के सर्वांगीण विकास के लिए आवश्यक जरूरतों को समझना सबसे ज्यादा महत्वपूर्ण हैं। बच्चों के लिए आवश्यक और उनकी जिद के बीच के अंतर को समझना चाहिए। अक्सर अभिभावक कहते है कि हम बच्चों के लिए पैसा कमाने में व्यस्त रहते है, लेकिन दुनिया में हर जरुरत पैसे से नहीं खरीद सकते या हर जरुरत को पैसे से पूरा नहीं किया जा सकता। 

बच्चों को सही समय पर उनका साथ देना जरुरी होता है, बच्चों के साथ दोस्त बनकर थोड़ा ही सही लेकिन समय बिताना भी जरुरी होता हैं। अपने बच्चे है इसलिए उनकी गलतियों पर पर्दा डालना या जिद करते है इसलिए उनकी नाजायज मांग भी पूरी करना तो सरासर गलत हैं। आज दुनिया भर में या हम जो समाज में अपराधी देखते है, शायद सही वक्त पर उन अपराधियों को उनके अभिभावकों ने अच्छी परवरिश, संस्कार और बेहतर पोषक वातावरण निर्माण कर दिया होता तो आज वे समाज के लिए नासूर न बने होते। रोजाना स्वस्थ नींद, नियमित रूप से व्यायाम, शारीरिक और मानसिक कसरत वाले खेल खेलना, समस्या का समाधान करने और पारस्परिक कौशल विकसित करना और भावनाओं को प्रबंधित करना सीखना जरुरी हैं। 

घर-परिवार, स्कूल और व्यापक समुदाय के भीतर एक सुरक्षात्मक और सहायक वातावरण महत्वपूर्ण हैं।
अध्ययन से पता चला है कि स्कूल जाने वाले बच्चों में मेंटल हेल्थ प्रॉब्लम 23.33 प्रतिशत है। पढ़ाई का दबाव, सोशल मीडिया का ज़्यादा इस्तेमाल और परिवार का टूटना तनाव में काफी योगदान देते हैं, जिसमें 43 प्रतिशत विद्यार्थी मूड स्विंग्स और 11 प्रतिशत चिंता की बात करते हैं। 10 प्रतिशत से भी कम युवा भारतीयों के पास औपचारिक मानसिक स्वास्थ्य सेवा तक पहुंच हैं। मानसिक स्वास्थ्य विकार में अधिकतम किशोर मदद लेने से झिझकते हैं। साइबरबुलिंग, सोशल तुलना और इंटरनेट की लत बढ़ रही है, 15-19 साल के बच्चों में शराब का सेवन काफी हैं। 13-17 साल के लगभग 7 प्रतिशत किशोरों को मानसिक स्वास्थ्य संबंधी विकार होते हैं, और युवाओं में मौत का सबसे बड़ा कारण आत्महत्या हैं। 

बच्चों को भावनात्मक रूप से मजबूत करने के लिए और मानसिक स्वास्थ्य के प्रति जागरूकता हेतु अभिभावकों ने बच्चों के साथ समय बिताना बहुत जरुरी हैं। शारीरिक गतिविधियां और मानसिक स्वास्थ्य के बीच एक पॉजिटिव रिश्ता होता है, खेलकूद करने पर तनाव कम होने लगता है, इसलिए अभिभावकों ने अपने बच्चों को साथ लेकर बाहर साइकिलिंग, स्केटिंग, स्विमिंग, हाइकिंग, या कोई भी मैदानी खेल खेलने ले जाना चाहिए। बच्चों के साथ हंसी मजाक करना, उन्हें सामाजिक कार्यों में भाग लेने के लिए स्वयंसेवक के रूप में प्रोत्साहित करना, साथ में खाना, नाश्ता करना, दिनभर के गतिविधियों पर चर्चा करना, हेल्दी हॉबी विकसित करना सिखाए, व्यायाम योगा का महत्त्व समझना, अच्छे संस्कार, भेदभाव को भूलकर मानवता का सन्देश देना, प्रकृति और देशसेवा को प्रथम स्थान देना जैसी बातें बच्चों को समझाना अभिभावकों, शिक्षकों का परम कर्तव्य हैं। बच्चों की खूबियों या फिर गलतियों को कभी नजरअंदाज न करें, उन्हें सही समय पर सही दिशा देना जरुरी होता हैं। इस प्रकार बच्चे शारीरिक और मानसिक रूप से मजबूत होंगे और बुरी आदतों से दूर रहेंगे, इससे उनमे मानसिक स्वास्थ्य समस्या उत्पन्न होने की संभावना नहीं होगी

- डॉ. प्रितम भि. गेडाम
prit00786@gmail.com
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