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कामकाजी माँ और बच्चों का सशक्त, परिपक्व भविष्य


जिन नन्हे बच्चे (लड़कियों- लड़कों) की माँ नौकरी करके अपने छोटे बच्चों को संभालकर घर और ऑफिस भी संभालती है, उन कामकाजी माँओं में समझदारी बहुत ज्यादा होती हैं। इन छोटे बच्चों को दिन भर माँ दिखाई नहीं देती, इसलिए ये बच्चे जल्दी ही परिपक्व (matured) हो जाते हैं।

आज के युग में स्त्रियों का कार्यक्षेत्र में सक्रिय योगदान परिवार को नई ऊँचाइयों तक ले जा रहा है। कामकाजी माँ न केवल आर्थिक रूप से परिवार को मजबूत बना रही हैं, बल्कि बच्चों को भी एक नया, सशक्त और आत्मनिर्भर भविष्य दे रही हैं।

माँ के कार्यरत होने से बच्चे समय से पहले स्वावलंबी बनते हैं। वे छोटी- छोटी जिम्मेदारियाँ खुद संभालना सीखते हैं, बच्चे समझदारी से अपनी भावनाओं को समझना और व्यक्त करना सीखते हैं। यह जल्दी परिपक्वता नकारात्मक नहीं, बल्कि एक सकारात्मक गुण है। ऐसे बच्चे भविष्य में अधिक जिम्मेदार, आत्मविश्वासी और जीवन की चुनौतियों का सामना करने में सक्षम होते हैं।

कार्यरत माँ बच्चों के लिए प्रेरणा का स्रोत बनती है। वे देखते हैं कि मेहनत, अनुशासन और संतुलन से सपनों को हासिल किया जा सकता है। इससे बच्चों में शिक्षा, करियर और स्वतंत्रता के प्रति सकारात्मक दृष्टिकोण विकसित होता है।

निस्संदेह, इस यात्रा में कुछ चुनौतियाँ भी आती हैं, लेकिन ये चुनौतियाँ परिवार को और अधिक मजबूत, समझदार और एकजुट बनाने का अवसर भी प्रदान करती हैं। पति- पत्नी के बीच जिम्मेदारियों का बंटवारा, फ्लेक्सिबल कार्य व्यवस्था, गुणवत्तापूर्ण डे- केयर सुविधाएँ और बच्चों के साथ बिताया जाने वाला सार्थक समय इन चुनौतियों को आसानी से पार करने में मदद करता है।

आज का आधुनिक परिवार इन सभी आयामों को संतुलित करते हुए आगे बढ़ रहा है। कामकाजी माँ का योगदान न केवल परिवार की आर्थिक स्थिति को मजबूत कर रहा है, बल्कि बच्चों को भी एक व्यापक दृष्टिकोण और जीवन कौशल प्रदान कर रहा है। रंग- बिरंगे बाजार की उस तस्वीर की तरह हमारा परिवार बाहर से जितना आकर्षक है, अंदर से भी उतना ही प्रेमपूर्ण, सशक्त और आशावादी होना चाहिए।

आज के युग में महंगाई की आग और जीवन- स्तर की ऊँची उड़ान की चाहत ने परिवार की पारंपरिक संरचना को चुनौती दी है। मध्यमवर्गीय घरानों में पति-पत्नी दोनों कार्यरत हैं। स्त्रियों का कार्यक्षेत्र में बढ़ता कदम निस्संदेह सामाजिक प्रगति का सुंदर प्रतीक है, किंतु इस प्रगति की छाया में नन्हे बच्चों का बचपन धीरे- धीरे ओझल होता जा रहा है।

माँ सुबह की पहली किरण के साथ घर से निकल जाती है और शाम की आखिरी रोशनी में थकी-हारी लौटती है। इस बीच नन्हीं माँ की गोद की उष्णता, लोरी की मीठी धुन और स्नेह भरी झिड़की से वंचित रह जाती हैं। क्रेच की दीवारें, आया की व्यावसायिक देखभाल या बुजुर्गों की थकी हुई निगाहें माँ के स्पर्श की जगह नहीं ले पातीं ये भी उतना ही सच है, पर कामकाजी माँ का घर मॅनेजमेंट करना काफी बेहतर होता है। 

डबल ड्युटी या फिर डबल शिफ्ट भी कह सकते है (घर संभालना और ऑफिस भी संभालना) पर हाऊस वाइफ से लोग काफी समझदार होते है| इनके पास फालतू बातो के लिए बिलकुल भी वक्त नही होता। ये रिश्तो को जोडकर रखते है| इसलिये ये अपने बच्चो को स्वालंबी बनाना सिखाते है। उनके बच्चे मिलकर एक बेहतर, समृद्ध और प्रगतिशील भारत का निर्माण कर रहे हैं। बचपन की मासूमियत के साथ- साथ जिम्मेदारी और आत्मनिर्भरता का संयोजन - यही आज के नए युग का सुंदर संतुलन है।

- डॉ. शेखर दंताळे
   नागपुर, महाराष्ट्र 
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