आज ईद
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ये काली रात,
इक मुट्ठी ख़ुशी
तलाशती रात,
और सीना फाड़
रोती रात।
ज़मीन के टुकड़े के
लिए पागल ये दुनिया,
डॉलर की चकाचौंध से
अंधी ये दुनिया,
बारूद के धमाकों से
बहरी ये दुनिया,
सच के तलाश में
झूठी ये दुनिया।
ये कैसी हमदर्दी
ये कैसा खेल,
चेहरे पे नादानी,
गिरेबान में ख़ंजर,
सस्ता ख़ून
और महंगा तेल।
कोई तो राह बताए
ऐ दोस्त,
काँधे का सहारा तो दे
कोई दोस्त,
खंजर को दूर रख,
गले तो लगाये कोई दोस्त,
खुश्क आँखों में सुनहरे
सपने सजाए तो कोई दोस्त।
- डॉ. शिवनारायण आचार्य
नागपुर, महाराष्ट्र