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समाधान, दृष्टिकोण की आज आवश्यकता है परस्पर संवाद : ओ. डी. जैन


नागपुर। नागपुर वैचारिक मंच द्वारा हिंदी साहित्य सम्मेलन के सभा कक्ष में आयोजित ‘परस्पर संवाद’ विषय पर सुप्रसिद्ध मंच संचालक व्यंग्य कवि डॉ सागर खादीवाला ने अपने विचारों को प्रमुखता से रखते हुए अभिव्यक्त किया कि मनुष्य, समाज, श्वांसो की जरूरत संवाद है। वैसे ही जैसे पहले पनघट, शादियों और घाटों पर आपसी संवाद की परंपरा रही है। साहित्यकार प्रभा मेहता ने संसद में संवाद के स्थान विवाद को उद्धृत कर, परिवार में बिखरते संवाद पर प्रश्न उठाया। साहित्य प्रेमी अनिल त्रिपाठी ने कहा यह हमारा दायित्व है कि आपसी संवाद को बनाए रखें और उसे बढ़ाएं।

अधिवक्ता ओ. डी. जैन ने इतिहास का पक्ष समझाते हुए आवश्यकताओं, समस्याओं से ही संवाद का विकास हुआ। संवाद ने समाधान और दृष्टिकोण की नींव रखी जो आज लगभग समाप्त हो रही है। पत्रकार टीकाराम साहू 'आजाद' में विज्ञान की प्रगति में जहां दुनिया को जोड़ा भी, वहीं आपसी संवाद से विरक्त भी किया। समीक्षक ओम प्रकाश शिव ने पाठक के मौन संवाद का जिक्र कर कहा पत्रकारिता ही संवाद का माध्यम बना हुआ है। मानव सामाजिक प्राणी है, जिसके केंद्र में संवाद ही उसका अस्तित्व है। सुप्रसिद्ध संगठक एस. पी. सिंह ने संवाद की निरंतरता की आवश्यकता बताते हुए, उसे नई पीढ़ी से संपर्क बना उनकी संवेदनाओं की अभिव्यक्ति की जरूरत पर बल दिया।

संपादक पत्रकार दुर्गा प्रसाद अग्रवाल ने कहा संतुलित संवाद का अस्तित्व जरूरी है। आज वातावरण विसंवाद की राह पर है। संपादक समीक्षक नरेंद्र परिहार ने आज समाज संस्कार, संस्कृति, समस्याओं के समाधान के लिए संगठन की आवश्यकता के साथ स्थापित मान्यताओं, बिंबो पर समीक्षात्मक संवाद की आवश्यकता है। विषय पर प्रस्तावना रख प्रसिद्ध व्यंग शिल्पी डॉ राजेंद्र पटोरिया ने बच्चों में बढ़ती संवादहीनता और एकाकीपन से व्यक्तियों में बढ़ते अंधत्व और पागलपन की विकृति में बदलता स्वरूप देख चिंता व्यक्त की। युद्ध और शांति विषय पर अगला कार्यक्रम निर्धारित कर आभार नरेंद्र परिहार ने माना। 
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