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मन की एंट्रोपी


अव्यवस्था सारी दुनिया में रहती है
लेकिन सब से 
सब से ज्यादा समस्या
चंचल मन के साथ रहती।

हरेक मन एक लॉकर रूम है
जहां मन के विचार, 
उसकी आशाएं, 
उस के सपने,
उस के डर,
और न जाने क्या क्या कैद रहता है।

लॉकर के बनने के पहले,
उसका कोड बन जाता है
इस के कारण हर लॉकर
खुलता ही खुलता है।

लेकिन मन की बात ही और है,
यहां तो यह भी पक्का नहीं रहता कि
लॉकर कहां है?
मन की अव्यवस्था का
अनुमान लगाना लगभग नामुमकिन है।

अगर मन एक साधारण कमरा है,
शुरू शुरू में बड़ा  सजा धजा
व्यवस्थित रहता।
विचार भी सीमित रहते
इच्छाएं सीमित रहती 
लेकिन बाद में एक एक
विचार आते रहता।
गतिशील बन जाता,
पुराने विचार ठिकाने लगते भी नहीं
तो नए विचार किसी
बरसाती नदी समान
मन में आते रहते।

यही मन की एंट्रोपी है,
अनेक विचार, अनेक विषय,
अनेक आदमी, अनेक भावनाएं,
अनेक आकांक्षाएं, सब मिलकर
मन को तहस नहस कर देते
बिल्कुल किसी उफान वाली
 नदी की धारा की तरह।
हम सब जानते है कि 
इस धारा को रोकना कितना कठिन है?

मन की गति असीम है,
तो मन हर एक विचार के
साथ जुड़ने देखता
जो मन के लिए भी कठिन रहता।
मन हर एक समस्या में उलझ जाता है,
शोर करने लगता है।
एक ही बात बारंबार दोहराते रहता,
की मुझे इन से शांति चाहिए।

मन को बाहर से आकर कोई भी
असंतुलित नहीं कर सकता,
ये तो अंदर की बात है,
जैसे किसी बंद कमरे में धूल
अपने आप जमती है,
वैसे ही मन में अव्यवस्था जमती है।

जब इंसान कहता है कि
मैं उलझ रहा हूं तो उस का 
मन किसी एक्साइटेड इलेक्ट्रॉन के समान
चौतरफा घूमते रहता।
इस को नियंत्रण करना कठिन होता
लेकिन असंभव नहीं।

जैसे हर घर को रोज साफ करना पड़ता
वैसे ही मन को भी साफ करना पड़ता।
जैसे किसी बच्चे को संस्कार देने पड़ते,
ठीक वैसे ही मन को भी संवारना पड़ता है।

अगर बिखरना मन का स्वभाव है तो
उसे संभाल कर रखना 
इंसान का कर्तव्य या कर्म है
ये किसी साधना से कम नहीं
और ये सिर्फ इंसान ही कर सकता है।

- राजेन्द्र चांदोरकर.. (अनिकेत)
   नागपुर, महाराष्ट्र
काव्य 6050555009734815942
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