बदल गया है वक्त
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बहारें आईं गईं अपनी
खूशबु बिखेरते हुए एक सपना सा बनता चला गया।।
अहम कम वहम मुखर दोनों के बीच की खाईयां बढ़ीं।
थे पास में ही इधर -उधर पर फासला गहराता चला गया।।
कुछ तो था हममें जो जोड़े था इस रिश्ते को वरना,
चलना था साथ जिंदगी के पर अकेले ही सफर कटता चला गया।।
अब मैं हूँ मेरी खामोशियां हैं, सुंदर सा रिहायशी घर भी है,
फिर भी है सन्नाटा यहां ये मकां न जाने कैसे वीरान सा होता चला गया।।
उम्मीद खत्म हो गयी है जिंदगी की अब,
बस सुकुन का इंतजार है,
टिमटिमाते दिए की रौशनी का गम दिल पर नश्तर चुभोता चला गया।।
- रामनारायण मिश्र
नागपुर, महाराष्ट्र
