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पेड़ पर लगे फल की व्यथा


अब खुद ही गिर जाओ तुम, टूटकर जमीं पर,
पत्थर मारने वाला इंसान तो सिर्फ, बुराई  करने में व्यस्त है।

अच्छी थी, पगडंडी अपनी,
सड़कों पर अब तो, भीड़ बहुत है।

फुर्र हो गई फुर्सत, अब तो,
सबके पास, इर्ष्या और द्वेष का काम बहुत है।

नहीं जरूरत, बुद्धि मानों की  अब,
हर शख्स,बिना कुछ किये ही होशियार बहुत है।

उजड़ गए, सब घर के बाग बगीचे,
फिर भी  गमलों में, पड़े पौधों की शान बहुत है।

मट्ठा, दही, तो  खाते नही,
और कहते हैं, ज़ुकाम बहुत है।

लेते हैं, जब चाय, की चुस्की तब,
कहते हैं, आराम बहुत है।

बंद हो गई, अब प्रेम की भाषा, 
व्हाट्सएप पर, पैगाम बहुत है।

आदी होगये हैं, ए.सी. के इतने,
और*कहते हैं बाहर का मौसम  गर्म बहुत है।

झुके-झुके, तो चलने लगे हैं,
और कहते हैं ढोने का, सामान बहुत है।

नही बचे, कोई सगे सम्बन्धी,
 पर अकड़, की शान बहुत है।

 जल गयी है रस्सी सारी,
 फिर भी ऐंठन का एहतराम बहुत है।

सुविधाओं का, ढेर लगा है,
पर इंसान दुसरों की खुशी से, परेशान बहुत है।

 - रामनारायण मिश्र
    नागपुर, महाराष्ट्र 
काव्य 1843612476787467617
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