व्यवस्था और अव्यवस्था
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व्यवस्था और अव्यवस्था।
ये शब्द
रोज़मर्रा की ज़िंदगी से लेकर
थर्मोडायनामिक्स (ऊष्मागतिकी) तक
फैले हुए हैं।
कहते हैं-
पूरा विश्व
व्यवस्था और अराजकता के बीच
झूलता रहता है।
इस अव्यवस्था को
अंग्रेज़ी में एंट्रोपी कहते हैं।
विश्व की एंट्रोपी को
मानव लगातार सुलझाने की
कोशिश करता है-
कम से कम प्रयास तो करता ही है।
सजी हुई ड्राइंग रूम को
बच्चे दस मिनट में अस्त-व्यस्त कर देते हैं-
बस, यही एंट्रोपी है।
अव्यवस्था में रहना,
और उसी में अपने कर्म करते रहना-
यही जीवन का मर्म है।
एंट्रोपी वह अडिग शक्ति है
जो पूरे विश्व को
अव्यवस्था की ओर खींचती रहती है।
लेकिन
सबसे छोटा जीव भी
इसके विरुद्ध लड़ता है।
एक छोटा-सा बीज,
कई फुट नीचे से
मिट्टी को चीरते हुए
सूरज की ओर बढ़ता है-
यह भी एक लड़ाई है।
मधुमक्खी
लाखों फूलों से रस इकट्ठा करती है,
मोम के घर बनाती है,
और शहद संजोती है-
यह भी अव्यवस्था के खिलाफ संघर्ष है।
इरविन श्रोडिंगर के अनुसार,
हर जीव इस
अव्यवस्था के विरुद्ध लड़ाई लड़ता है।
हर श्वास,
हर पल,
हर दिन-
यह संघर्ष जारी रहता है।
बड़ा या छोटा मायने नहीं रखता,
कितनी देर चलता है-
यह भी नहीं।
बस चल रहा है-
यही सबसे महत्वपूर्ण है।
अगर आप बाधाओं को
दीवार समझते हैं-
तो आप रुक जाएंगे,
और अव्यवस्था जीत जाएगी।
लेकिन अगर आप उन्हें
एक हर्डल समझकर पार करते हैं-
तो उस पल
आप विजेता होते हैं।
हालाँकि-
लड़ाई जारी रहती है।
समझने की बात यह है:
चीज़ें अपने आप बिगड़ती हैं,
लेकिन अपने आप सँवरती नहीं।
प्रकृति की अव्यवस्था को
सुधारने और सँवारने का प्रयास
मानव करता है।
वैसे भी-
बिखरना प्रकृति है,
जुड़ना साधना है।
अव्यवस्था सहज है,
व्यवस्था प्रयास है।
और यह प्रयास
मानव कर सकता है,
क्योंकि एंट्रोपी अपने आप बढ़ती है,
लेकिन व्यवस्था बनाने के लिए
ऊर्जा, बुद्धि और श्रम चाहिए-
और यह सामर्थ्य
मनुष्य के पास है।
- राजेन्द्र चांदोरकर (अनिकेत)
नागपुर, महाराष्ट्र
