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छत्तीसगढ़ की सांस्कृतिक उत्सव में युवाओं की भूमिका : डॉ. विजया लक्ष्मी रामटेके


नागपुर। विश्व हिंदी साहित्य सेवा संस्थान प्रयागराज, छत्तीसगढ़ी इकाई के द्वारा राष्ट्रीय आभासी संगोष्ठी का आयोजन किया गया| जिसकी अध्यक्षता डॉ. विजयलक्ष्मी रामटेके अध्यक्ष विश्व हिंदी साहित्य सेवा संस्थान प्रयागराज नें अपने अध्यक्षी य  उद्बोधन में कहा कि छत्तीसगढ़ के सांस्कृतिक उत्सवों में युवा पारम्परिक कलाओं को जीवित रखने, नई विधाओं को जोड़ने और आयोजन प्रबन्धन में महत्त्वपूर्ण भूमिका निभा रहे हैं युवा महोत्सव, बस्तर दशहरा और हरेली जैसे आयोजनों में युवा लोक संगीत, चित्रकला, पारम्परिक खेलों और तकनीकी नवाचार के माध्यम से छत्तीसगढ़ी संस्कृति को संरक्षित कर रहे हैं और आधुनिक पीढी से जोड़ रहे हैं| 

प्रस्तावना उद्बोधन देते हुए डॉ.मुक्ता कान्हा कौशिक, विश्व हिंदी साहित्य सेवा संस्थान प्रयागराज, छत्तीसगढ़ इकाई ने कहा कि छत्तीसगढ़ के युवा पीढ़ी  को छत्तीसगढ़ के सांस्कृतिक उत्सव मैं अपने रीति रिवाज परंपराएं और संस्कृति को महत्व देते हुए अपने जीवन में उता रे| इस आभासी  संगोष्ठी में अतिथि के रूप में उपस्थित डॉ. गोकुलेश्वर कुमार द्विवेदी सचिव विश्व हिंदी साहित्य सेवा संस्थान प्रयागराज ने कहा कि यह विषय युवाओं को प्रेरित करता है कि वह अपने राज्य की सांस्कृतिक उत्सव को आगे  पीढ़ी तक पहुंचाएं। 

वक्ता के रूप में उपस्थित श्री लक्ष्मीकांत वैष्णव, युवा सांसद प्रभारी,कोरबा छत्तीसगढ़ ने कहा कि छत्तीसगढ़ के सांस्कृतिक उत्सवों में युवाओं की भूमिका आज अत्यंत महत्वपूर्ण हो गई है। मैं मानता हूँ कि युवा ही हमारी लोकसंस्कृति के सच्चे संवाहक हैं, जो पंथी, राऊत नाचा और सुआ नृत्य जैसी परंपराओं को जीवंत बनाए हुए हैं। डिजिटल माध्यमों के जरिए युवा हमारी संस्कृति को नई पहचान दिला रहे हैं और राजिम कुंभ व बस्तर दशहरा जैसे आयोजनों में सक्रिय भागीदारी निभा रहे हैं। वर्तमान समय में युवा न केवल परंपरा को आगे बढ़ा रहे हैं, बल्कि उसमें नवाचार कर उसे और अधिक आकर्षक बना रहे हैं। वैश्वीकरण के इस दौर में अपनी संस्कृति को बचाए रखना हम सभी युवाओं की जिम्मेदारी है। 

मैं सभी युवाओं से आह्वान करता हूँ कि वे अपनी भाषा, वेशभूषा और परंपराओं को अपनाकर हमारी सांस्कृतिक विरासत को सशक्त बनाएं। वक्ता  कुमारी माधवी साहू, छत्तीसगढ़ ने कहा कि अगर किसी पेड़ की जड़ें कट जाएँ, तो वह कभी हरा-भरा नहीं रह सकता, ठीक उसी प्रकार हमारी संस्कृति भी हमारी जड़ों से जुड़ी है और वही हमारी पहचान बनाती है। छत्तीसगढ़ के हरेली जैसे उत्सव हमारी परंपरा और जीवन का अभिन्न हिस्सा हैं, लेकिन आज की सच्चाई यह है कि हम उत्सवों के बीच रहकर भी उनसे पूरी तरह जुड़ नहीं पा रहे और धीरे-धीरे अपनी जड़ों से दूर होते जा रहे हैं। फिर भी उम्मीद अभी जिंदा है, क्योंकि युवा हैं, और वही इस संस्कृति के वर्तमान रक्षक हैं। युवा बस्तर दशहरा और तीजा जैसे उत्सवों में भाग लेकर न केवल परंपराओं को निभा रहे हैं, बल्कि उन्हें जी रहे हैं और आगे बढ़ा रहे हैं। 

आज का युवा परंपरा और तकनीक को जोड़कर संस्कृति का डिजिटल दूत बन रहा है, जो अपनी संस्कृति को नई दिशा और पहचान दे रहा है। लेकिन आधुनिकता की दौड़ में अपनी जड़ों को भूलना सबसे बड़ा खतरा है, जो हमारी पहचान को कमजोर कर सकता है। इसलिए संस्कृति को बचाना हर युवा की जिम्मेदारी है- उसे सीखना, उसे जीना और उसे आगे बढ़ाना, क्योंकि जब युवा अपनी जिम्मेदारी को समझता है और उसे निभाता है, तो संस्कृति सुरक्षित रहती है और हमेशा के लिए अमर हो जाती है। कार्यक्रम का प्रारंभ डॉ. अवंतिका शर्मा के सरस्वती वंदना से हुआ। स्वागत उद्बोधन डॉक्टर सरस्वती वर्मा, सहायक प्राध्यापक महासमुंद  के द्वारा किया गया। आभार  डॉ. नम्रता ध्रुव सहायक प्रा ध्यापक छत्तीसगढ़ के द्वारा किया गया। इस राष्ट्रीय आभासी सगोष्ठी में आभासी पटल पर महाराष्ट्र  के प्रभारी डॉ. भरत शेणकर, प्रयागराज की प्रभारी श्रीमती पुष्पा शैली एवं अनेक साहित्यकार शिक्षाविद, एवं गणमान्य नागरिक उपस्थित रहे।
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