Loading...

काश.. मेरी अहमियत भी समझी जाती


कभी गुमान था मुझे कि मैं 
पापा की ज़िंदगी का एक खास हिस्सा हूँ,
पर वक्त ने सिखा दिया कि मैं 
सिर्फ एक विकल्प थी, उनकी ज़रूरत नहीं।

सबके चेहरे की मुस्कान के लिए मैं 
हमेशा ढाल बनी खड़ी रही,
पर जब मेरी रूह थक कर चूर हुई, 
तो सिर रखने के लिए कोई कंधा न था।

सबने कहा 'तुम हमेशा हस्ती हो', और इसी जुमले की आड़ में 
किसी ने मेरा हाथ थामने की कोशिश तक नहीं की।
मेरे माँ- बाप की दुनिया उनके 
दो लाडलों के इर्द- गिर्द सिमटी थी,

मैं उनके सुख की खातिर अपना वजूद, 
अपना सुकून और अपना वक्त लुटाती रही।
शायद मेरी यही 'मौजूदगी' मेरी सबसे बड़ी भूल बन गई,
उन्हें लगा कि मेरे पास तो बस खाली वक्त ही वक्त है।

मैं थकती रही, टूटती रही, पर रुकना नहीं सीखा।
मेरे पति ने इस 'कलयुग' में वो मिसाल पेश की 
जो आज के बेटे भी नहीं कर पाते,
पूरी शिद्दत से सास-ससुर की सेवा की, उनका मान रखा।

पर कड़वा सच तो यही है कि इतनी कुर्बानियों के बाद भी,
आज हम ही उनकी नज़रों में गुनेहगार और बुरे बन गए।
अब आँखों से आंसू भी नहीं गिरते, क्योंकि 
दिल ने हकीकत को गले लगा लिया है-

हम उनके लिए कभी उतने ज़रूरी थे ही नहीं, 
जितना हमने खुद को समझ लिया था।
जब भी देने की बारी आयी पापा ने लाडली बेटी 
और बेटे के लिये मुझसे ज्यादा दिया।
मुझे तो सिर्फ इस कलियुग में कर्तव्य सिखाकर इस्तेमाल किया।

- डॉ. शेखर दंताळे
   नागपुर, महाराष्ट्र 
काव्य 2365137097069717081
मुख्यपृष्ठ item

ADS

Popular Posts

Random Posts

3/random/post-list

Flickr Photo

3/Sports/post-list