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चित्रकार डॉ. सविन्द्र सावरकर को मिला लाइफ टाइम अचीवमेंट अवार्ड


नागपुर/दिल्ली। दक्षिण भारत के प्रसिद्ध फ़िल्म निर्देशक पा . रंजीत के हाथों नागपुर के चित्रकार एवं कॉलेज ऑफ़ आर्ट नई दिल्ली से हाल ही में सेवानिवृत प्राध्यापक अम्बेडकर राइट चित्रकार डॉ सविन्द्र सावरकर को लाइफ टाइम अवॉर्ड से नवाज़ा गया। हाल ही में  देश भर के चित्रकारों को गौरव प्रदान करने वाली विख्यात संस्था  वानम द्वारा चेन्नई में आयोजित वानम आर्ट फेस्टिवल के अंतर्गत 'द होल स्टोरी : दलित एस्थेटिक्स आर्ट शो 2026' में, नीलम कल्चरल सेंटर के संस्थापक कबाली, अट्टाकथी, मद्रास, काला जैसी फिल्मों के निर्देशक पा. रंजीत के कर-कमलों से यह सम्मान प्रदान किया गया। 


इस गरिमामयी अवसर पर डॉ सुखदेव थोराट (पूर्व यूजीसी चेयरमैन एवं प्रोफेसर एमरेटस, जवाहरलाल नेहरू यूनिवर्सिटी , दिल्ली), नामवर चित्रकार चंद्रु मद्रास गवर्मेंट कॉलेज के सेवानिवृत प्रिंसिपल और विख्यात और डॉ. सविन्द्र सावरकर के कार्यों पर शोध कार्य करने वाली श्रीमती डॉ.सुज़ान की उपस्थिति ने समारोह को और भी विशिष्ट बना दिया। अस्पृश्यता, देवदासी प्रथा, अल्पसंख्यक वेदना, बाल मजदूरी और यहाँ तक कि क्वांटम फिजिक्स जैसे जटिल विषयों को अपनी पेंटिंग्स में रूपतंरित कर विश्व का ध्यान आकर्षित करने वाले डॉ. सविन्द्र सावरकर को यह लाइफटाइम अचीवमेंट अवॉर्ड प्रदान किया गया।

नागपुर की मिट्टी में जब रंग पहली बार किसी बच्चे की उंगलियों पर चढ़ते हैं, तो उँगलियाँ केवल चित्र नहीं बनातीं , वे अपनी ज़मीन की स्मृतियों को आकार देती हैं। ऐसे ही रंगों से जन्मे एक कलाकार हैं डॉ. सविन्द्र सावरकर, जिनकी कला में केवल रेखाएँ नहीं, बल्कि इतिहास की धड़कन सुनाई देती है।हरिभाऊ महादेव राव और ताराबाई हरिभाऊ सावरकर के आँगन में पले- बढ़े सविन्द्र, नागपुर की उस सोंधी धरती के पुत्र हैं जहाँ संघर्ष भी परंपरा है और संवेदना भी संस्कार। चित्रकला महाविद्यालय से बी.एफ.ए. और महाराजा सायजीराव यूनिवर्सिटी ऑफ़ बड़ोदा से एम.एफ.ए. की शिक्षा प्राप्त कर उन्होंने रंगों को केवल सजावट नहीं, बल्कि प्रतिरोध की भाषा बना दिया।

उनकी कला किसी गैलरी की दीवार पर टंगी चुप तस्वीर नहीं, बल्कि एक पुकार है  एक ऐसी आवाज़, जो उन लोगों के भीतर से उठती है जिन्हें सदियों से चुप रहने को मजबूर किया गया। उनके चित्रों में दलित जीवन की वेदना है, आत्मकथाओं की सच्चाई है, और समाज के आईने में छुपी दरारों का स्पष्ट प्रतिबिंब है। जिनके हर स्ट्रोक में जीवन सांस लेता है। तैलचित्र, भित्तिचित्र और ग्राफिक प्रिंट मेकिंग पेंटिंग में उनकी महारत सिर्फ़ तकनीक नहीं, एक तपस्या का परिणाम है। उनके द्वारा रचित कृतियाँ 'वॉइस फॉर द वॉइसलेस' जैसी प्रदर्शनियों न केवल देखी जाती हैं, बल्कि महसूस की जाती हैं  जैसे हर रंग अपने भीतर एक इतिहास समेटे हो।

अमेरिका, जर्मनी, लन्दन जैसे अंतरराष्ट्रीय मंचों तक पहुँची उनकी कला ने यह सिद्ध किया कि दर्द जब अभिव्यक्ति पाता है, तो वह सीमाओं को पार कर जाता है। अमेरिका के आयोवा स्टेट यूनिवर्सिटी में आयोजित 'एनिहिलेशन ऑफ़ कास्ट' जैसे प्रदर्शन उनकी कला की वैश्विक गूँज का प्रमाण हैं।
यह सम्मान केवल एक कलाकार का सम्मान नहीं, बल्कि उन अनगिनत कहानियों का सम्मान है, जिन्हें उन्होंने अपने रंगों में जीवित रखा। डॉ. सविन्द्र सावरकर की कला हमें सिखाती है कि चित्र केवल देखे नहीं जाते, उन्हें पढ़ा जाता है, सुना जाता है, और सबसे बढ़कर-  महसूस किया जाता है। उनकी कूची जब चलती है, तो वह कैनवास पर रंग नहीं, बल्कि समाज की चेतना उकेरती है।
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