अमर प्रेम
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आकर मुझसे
इठलाती हुई बोली
ईश्वर ने तुझको
उत्तम कुमार बना
ऊपर से ज्ञान देकर
ऋषि सा आकर्षक
एकमेव प्यारा पुतला
ऐश्वर्य के साथ
ओंठो का दे माधुर्य
औरों से अलग
अंग प्रत्यंग खिला
अह: मुझे दिखलाया
कह भी दो प्रिय
खग से उड़ो न
गुरूर मेरा
घनघोर घटा यामिनी सा
चल पड़ा उमड़ घुमड़
छोटी सी टहनी पर
जगमगाता हुआ
झंकार की नाद पर
टकराता हुआ
ठौर खोजता
डाल डाल ,पात पात
ढलते ढलते चांद तक
तरतरित ऊर्जा ले
थम सा गया क्यों
दल ब दल सहित
धन्यवाद की मुद्रा में
नादान यह दिल
प्रेम की गुदगुदी ले
फरेबी सा एहसास लिए
बन ठनकर आज
भला सा, मासूम सा
मन में कुलाठें मारता
यही तो वह है
रब की अनुपम भेंट
लाल परी सी
वशीभूत मेरे
शर्म वर्म त्याग अब
षड्यंत्र में फंसी हो
सदा प्रियतम को खोजे
हतप्रभ सी
क्षण क्षण खुद को भूल
त्रयमंबकेश्वर के दामन
ज्ञान परंपरा में प्यार को
- नरेंद्र सिंह परिहार
नागपुर, महाराष्ट्र