21वीं सदी का शिक्षक
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शिक्षक शब्द की उत्पत्ति के बारे में यह बात ज्ञात होती है कि यह शब्द संस्कृत से आया है। संस्कृत में 'शिक्ष’ का अर्थ है- सीखना, सिखाना। उसमें ‘शिक्ष + अक' प्रत्यय जोड़ने पर वह शिक्षक बना यानी सिखाने वाला। शिक्षक की परिभाषा की जाए तो वह व्यक्ति जो एक मार्गदर्शक बनकर ज्ञान, कौशल,मूल्य और दृष्टिकोण को दूसरों तक पहुँचाता है वह शिक्षक है। शिक्षक का शाब्दीक अर्थ निकाला जाए तो 'शि'- शिखर तक पहुंचाने वाला, 'क्ष'- क्षमा का भाव रखने वाला, 'क' - कमजोरियों को दूर करने वाला होता है।
प्राचीन काल में गुरुकुल प्रणाली थी तब शिक्षा के केंद्र गुरुकुल होते थे। तब शिष्य बाल्यावस्था की आयु में उपनयन संस्कार के बाद गुरु के आश्रम में जाते और किशोरावस्था तक वही रहकर शिक्षा ग्रहण करते थे। शिष्य आश्रम में काम करते और गुरु बिना किसी शुल्क के विद्या देते। उस समय ग्रंथ कम होने के कारण गुरु मौखिक रूप से पढ़ाते थे तब विद्यार्थी श्रवण और स्मरण के आधार पर वेद, उपनिषद आयुर्वेद, गणित, दर्शन, खगोल, धनुर्विद्या, संगीत की विद्या सुनकर उसे कंठस्थ करते थे। तब शंकाओं का समाधान प्राप्त करने पर जोर था। गुरु से प्रश्न पूछना उनका अपमान नही शिष्य के जिज्ञासा और उत्सुकता का विषय था।
आज हम इक्कीसवीं सदी के विज्ञान और तकनीकी युग में जी रहे है, जिसमें हम काफी बदलाव देख रहे है। इस बदलाव में गुरुकुल प्रणाली से शिक्षा संस्थान, विश्वविद्यालय और कोचिंग एकेडमी ने जगह ले ली है। अब शिक्षक निशुल्क विद्या नही बल्कि वह वेतन पाता है। कुछ वर्षों पहले शिक्षक ब्लैकबोर्ड और चॉक तक सीमित था लेकिन अब व्हाइट बोर्ड - मार्कर, लैपटॉप, इंटरनेट का उपयोग करता है। वर्तमान समयमें कृत्रीम बुद्धिमत्ता यानी आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस का शिक्षक को साथ मिल रहा है। रोबोटिक ए आय शिक्षक का शिक्षा के क्षेत्र में उपयोग बढ़ रहा है, जिससे शिक्षक का मार्ग सुगम हो गया है। आज का शिक्षक विद्यार्थियों का संपूर्ण व्यक्तित्व विकास करना चाहता है। इक्कीसवीं सदी में गूगल और यूट्यूब से मिली जानकारियों को आज के शिक्षक गलत और सही की पहचान कराते हैं।
बदलते युग में शिक्षकों ने पुस्तक और तकनीकी इन दोनों से मित्रता कर ली है। कोरोना काल के बाद तो ऑनलाइन शिक्षा जैसे अनिवार्य हो गया। स्मार्ट क्लास, ऑनलाइन क्विज, ए आई टूल्स, वर्चुअल लैब अब पढ़ाने का माध्यम बन गया है। आज का शिक्षक प्रोजेक्टर पर भी सिखाता है। शिक्षा का साक्षरता मिशन अब डिजिटल साक्षरता मिशन बनते जा रहा है और शिक्षक उसका हिस्सा है। आज की शिक्षा प्रणाली विभिन्नताओं से भरी है। सभी विद्यार्थी एक साथ बैठकर सभी प्रकार की भाषाएँ, संस्कृति और नई-नई शिक्षा, जिज्ञासाओ को सीखना चाहती है। आज के शिक्षक उसका समाधान करते है। शिक्षक देश का निर्माता है, वह जानता है कि विद्यार्थी देश का भविष्य है। इसलिए वह विद्यार्थियो को अफवाह और झूठी खबरों के दौर में सच्चाई को परखना मोबाइल की लत में पड़े विद्यार्थियों को जागरुक करना, भारतीय संस्कृति और उनके मूल्यों को बचाना भी आज के शिक्षकों पर बहुत बड़ी जिम्मेदारी है।
आज एक बात चिंतनीय है कि इक्कीसवी सदी का एक शिक्षक वर्ग स्वयं मोबाइल की जकड़ में है। पाश्चात्य संस्कृति को अनजाने ही स्वीकार कर रहा है। उनका रहन-सहन, खान-पान, आचार-व्यवहार, बातचीत का ढंग काफी बदल गया है। समय के साथ उनके परिधानों में बदलाव और विचारों में बदलाव होते जारहे है। प्राचीन काल में शिक्षकों में शांति, अहिंसा, सहनशक्ति, धैर्यता, स्नेह, विनम्रता, सादगी, सहजता आदि गुण दिखा देते थे, किंतु इक्कीसवी के सदी के एक शिक्षक वर्ग में यह गुण विलुप्त होते जा रहे है, वे अधिक गुस्सैल, उद्विग्न, घृणा, ईर्ष्यालु, स्वार्थी प्रवृत्ति के हो रहे है। एक-दूसरे के प्रति राजनीति, आपसी गुटबाजी में उलझे होते है। आज इक्कीसवीं के सदी के कई शिक्षक शराब, सिगरेट और मादक पदार्थों का सेवन भी करने लगे है। अखबारों में पढ़ रहे शिक्षकों पर हो रहे हमले और कुछ आपराधिक शिक्षकों के द्वारा किए गए अपराध भी इसी गलत पदार्थों के सेवन का नतीजा है। इक्कीसवीं सदी का एक शिक्षक वर्ग यदि तकनीकी से नई ऊँचाइयों को छू रहा है तो दूसरा वर्ग भारतीय संस्कृति व नैतिक मूल्यों के पतन का कारण बन रहा है।
इक्कीसवीं सदी के शिक्षक को संवेदनशील बनना होगा, सभी विद्यार्थियों के लिए प्रेरणास्त्रोत बनना होगा। अच्छी परंपराओं और आधुनिकताओं को जोड़ना होगा। कृत्रिम बुद्धिमत्ता के इस दौर में उसका अधिक प्रयोग न करके जिंदा इंसान को कृत्रिम होने से बचाना होगा। विद्यार्थी को बेहतर इंसान बनने के लिए पूर्ण ध्यान केंद्रित करना होगा। इक्कीसवीं सदी में भले ही शिक्षको को तकनीकी का साथ मिल रहा है लेकिन विद्यार्थियों के लिए गुरु शिष्य का जो मानवीय रिश्ता, मानवीय स्पर्श जिससे विद्यार्थियों को हिम्मत, हौसला, प्रेरणा, सहानुभूति, नैतिक मूल्य प्राप्त होते है वह कोई मोबाइल का ऐप नही दे सकता। प्राचीन काल हो या आधुनिक युग शिक्षको को ही यह दायित्व निभाना होगा।
- प्रा. सूरज तेलंग
एम ए ( हिन्दी), बी.एड, बी.एम.सी., एम.लिब
नागपुर, महाराष्ट्र
