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रंग सौंदर्य का उद्गाता नवरंग


कृतिकार- संतोष पाण्डेय बादल

समीक्षक-  इन्दिरा किसलय 

साहित्य जगत में चर्चित वादों की गुंजलक से मुक्त सुकवि संतोष पांडेय 'बादल' अपनी ही धुन में रहते हुए सृजन करते हैं ।जो कुछ है हृदय सत्ता का उपहार है, उत्सव है। नितांत मौलिक कल्लोलिनी की तरह अविरत प्रवाहमान।कहने की ज़रूरत नहीं कि बादल की अधिकांश कविताओं में, नदी अपने तरल वैभव, अकूत स्नेह तो कभी वर्तमान की दुर्दशा के साथ उपस्थित है। अपने इलाके की 'दूअर नदी' से प्रीत गहरी है। ओरहन एक हृदय स्पर्शी नाद संजोए हुए है।

पर्यावरण ध्वंस की पीड़ा से व्यथित कवि के उद्गार नवरंग में, अपनी समूची अर्थवत्ता के साथ मौजूद हैं। कहाँ मिट गए सारे परिदृश्य, कहाँ खो गई आज बताओ वृक्षों की हरियाली, जीवन की बहुविध व्यंजना में प्रकृति के क्षत शृंगार से उपजी टीस है। वे कहते हैं- कौन बताए कि दोषी कौन है। आदमी तो आज भी मौन है।

प्रकृति का हर उपादान मानवता के हक में है। जिसका  एक संस्कृत श्लोक भी उसे प्रमाणित करता है - परोपकाराय वहन्ति नद्यः इसी तर्ज पर बादल पूछते हैं,- कहो, नीर कब पिया नदी ने?
दीपक भी उजास से प्रतिश्रुत है। नदी, दीपक, सूरज, पर्वत या वन सभी तो परोपकारार्थ अस्तित्व की व्याख्या करते हैं।

रूप की मीमांसा करती हुई कुछ कविताएँ भी द्रष्टव्य हैं- जैसे चमेली के फूल, सूरज कहता, भूधर प्यारा कविता भी इसी की प्रतीति कराती है। इसमें कभी व्यतिक्रम उत्पन्न नहीं होता ।लेकिन मनुष्यकृत लालसाओं पर भाष्य करना कठिन है।

पर्यावरण में मानवीय चेतना की अखंड भागीदारी है। वर्तमान में सृजन के अनुपात में संहारक दृश्यों की अधिकता है। कश्मीर हत्याकांड पर भी दृष्टि है उनकी रक्त नहाई, केशर की धरती, लाज न आई- प्रकृति के रुदन में मूल्यहीन राजनीति केंद्रित है। ऋषिकेश का पावन सौंदर्य अस्तित्व की महिमा का उद्गाता है। अतीन्द्रिय सत्ता उन्हें जीवन के हर पड़ाव से होती हुई अपने विराट स्वरूप का दर्शन करवाती है।

बादल मात्र रूप के गायक नहीं हैं, ना ही नाश की चित्रदीर्घा के आयोजक, वे मुल्क को नव विश्व का नूतन चितेरा- बनाने को संकल्पित हैं। वे स्वयं को आश्वस्त करते हैं- कलम कभी न झुकने पाए गीत कभी न रुकने पाए।

गति और संघर्ष ही जीवन को परिभाषित करते हैं जीवन पथ पर अयाचित दृश्य उभरते हैं पर आत्मसम्मान की रक्षा भी, मानव धर्म है। वे पूरे विश्वास से कहते हैं कि - मेरे शब्द मिटा दे कोई इतना भी आसान नहीं हूँ- कृति की शीर्षक कविता में देशभक्ति, वात्सल्य, आज़ादी, धैर्य, त्याग, निष्ठा, दया, क्षमा, प्यार, श्रद्धा जैसे सारे रंगों की प्रतिष्ठा है। प्रकृति का निरामय ऐश्वर्य मुश्किल से सुलभ होता है क्योंकि सबने चेहरे पर चेहरा यहाँ लगाया है- या हर चेहरे पर यहाँ मुखौटे- जीवन को परिभाषित करना इतना भी आसान नहीं है - पीकर आँसू सदा जगत में पड़ता है मुस्काना।

सर्वहारा का दर्द बादल को सदैव विचलित करता है। उनके हक में वे वाणी का आह्वान करते हैं।शब्दजल वर्षा करते हैं ।निज मन की व्यथा का विश्व पीड़ा में समाहार बादल की सृजन सामर्थ्य का उच्चांक है- है कठिन संग्राम जीवन - तमाछन्न परिवेश में वे उजालों के आचरण की प्रशंसा तक स्वयं को सीमित नहीं करते प्रत्युत भावी के लिए आशा के संवाहक हैं। उपभोक्तावाद का चरम पग-पग पर चुनौती देता है - यह जग है बाजार अनोखा कदम-कदम पर यहाँ है धोखा।

कृति के अधिकांश स्वर आत्मानुसंधान तक पहुंचे हैं। भावना और विचारों के आरोह-अवरोह निष्कपट रूप से चित्रित हुए हैं। परिस्थितियों के घात- संघात, स्वप्न और यादें। पिंजर का पाखी एक शानदार कविता है जो स्वतंत्रता और आत्मसम्मान की प्रवक्ता है। जैसे अद्भुत मेरे मन की पीड़ा में - सबको मैं सलिल पिलाता हूँ - यहाँ बादल का शब्द वैविध्य का मोह छलकता है।यहां सलिल शब्द किंचित असहज कर जाता है। 
महादेवी  वर्माजी का प्रभाव उनके अवचेतन मन में संग्रहित है जो यदा कदा कविताओं की धुन में स्पष्ट नजर आता है जैसे-
प्राण तो है चिर अकेला- नवरंग तक आते- आते उनके मौलिक एवं शास्त्रीय काव्यशिल्प का पूरा परिचय मिल जाता है। नाम पढ़े बिना कवि का नाम उसकी शैली से प्रसूत हो यह सृजन के अनगढ़पन की सफलता है। स्पष्टतः वे छायावाद एवं प्रगतिवाद के संगम पर खड़े हैं। प्रकृति का विराट तंत्र उन्हें रहस्यवादी अभिव्यंजना करवाता है। सर्वहारा का वैकल्य उनके मन की अनुरागी वृत्ति से अलग पीड़ा में डुबो देता है।
वे भाषाई शुचिता के पक्षधर हैं। भाषाई दारिद्र्य पर वे गहन मंथन करते हैं। कितने ही अभिजात शब्द, वर्तमान हाइब्रिड भाषा चलन से उजड़ गए हैं, जिन्हें बादल ने पुनर्जीवन दिया है- जैसे धनुही, तूरी
ण, क्षीरपाक, गोड़, शटक, रद, अनी, सींडा, स्यंदन, परेवा, ओरहन, ऋजुरोहित, शुक्तिज - ये समस्त शब्द नवरंग में साकार हुए हैं। 
दर्द वादों का अनुगामी नहीं होता, वह प्रकृत है।, संघर्ष ही गति का पर्याय है, स्वप्न कदमों को गति प्रदान करते है।कर्म वाद में आस्था पथ पर अडिग रखती है, कदम-कदम पर विचलन है, पर मिट्टी का आकर्षण बादल को योद्धा बनाए रखता है। धरती पर हरीतिमा के उत्सव के लिए और यही कृति की सफलता है ।निश्चय ही नवरंग काव्यकृति पाठकीय चेतना को उद्वेलित करेगी ऐसा विश्वास है।
समिक्षा 249137287963357623
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