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प्रभु ने अपने 'सखा' को ईश- लोक में बुला लिया


असंख्य आंखें हुईं नम, विश्व भर के सिंधी समाज में छा गया मातम

- वीरेन्द्र घनश्याम कुकरेजा, ब्रह्मलीन संत साधराम जी का अनन्य भक्त 

यह आध्यात्मिक उक्ति पूर्णतः सत्य है - "संतन के मन रहत है, सबके हित की बात...! घट-घट देखैं अलख को, पूछैं जात न पात.! इन पंक्तियों को शब्दशः साकार किया, विश्व-वंदनीय सत्गुरु साईं साधराम साहिब जी ने, जो पार्थिव रूप से भले ही अब हमारे बीच नहीं रहे, उनके उपदेशों एवं आदर्शों की प्रखर ज्योति चिरकाल तक सम्पूर्ण ब्रह्माण्ड को आलोकित करती रहेगी. मंगलवार सुबह ब्रह्म मुहूर्त में उनके परलोक-गमन का समाचार प्रसारित हुआ, साईंजन के करोड़ों-अरबों सिंधी अनुयायियों की आंखों से अविरल अश्रुधारा फूट पड़ी. हर मुख पर केवल एक ही प्रश्न था - ईश्वर को इतनी भी क्या जल्दी थी कि अपने अंतरंग "सखा" को असमय ही अपने श्रीचरणों में वापस बुला लिया...?
लेकिन विधि के विधान को आज तक भला कोई टाल सका है...? कुछ ही क्षणों में हृदय को विदीर्ण करने वाला यह समाचार देश-विदेश में फैल गया. एकाएक तो किसी को विश्वास ही नहीं हुआ, किन्तु पुष्टि होते ही संसार भर में मातम छा गया. रोते-बिलखते भक्तों ने इसे प्रकृति का घोर प्रहार मानते हुए, एक-दूजे को सांत्वना देना प्रारंभ कर दिया. फिर शुरू हुआ अपने प्राणसम प्रिय साईंजन को श्रद्धांजलि देने का अनवरत सिलसिला...! 

श्रीकृष्ण- सा सम्मोहन 

हजूरी रूप संत साधराम का जन्म 25 अक्टूबर 1963 को शुक्रवार के दिन पवित्र रहड़की साहिब में हुआ था. जन्म के समय से ही उनके मोहक मुखमंडल पर भगवान श्रीकृष्ण-सी मासूम दिव्यता थी, जो आजीवन विद्यमान रही. उनके पिता संत भगवानदास साहिब, शहंशाह सत्गुरु स्वामी सतरामदास के समर्पित अनुयायी थे. शिशु साधराम जब केवल 6 दिन के थे, उनकी माताश्री देवलोक सिधार गईं. बालक का पालन-पोषण अध्यात्म, भक्ति एवं जनसेवा के वातावरण में हुआ. युवा होते होते उन्होंने कई आध्यात्मिक एवं अन्य विषयों के ग्रंथों का गहन अध्ययन कर लिया था. उनकी भोली-भाली मुस्कान और तेजस्विता को देखते हुए संत शिरोमणि सतरामदास के तत्कालीन गद्दीनशीन दूल्हा दरवेश संत साईं कन्हैयालाल साहिब ने उन्हें अपने इहलोक छोड़ने के पश्चात अपना उत्तराधिकारी बनने का आग्रह किया, जिसे उन्होंने सहर्ष ही आदेश के रूप में शिरोधार्य कर लिया. 

प्रभु- स्मरण और ध्यान 

साईं कन्हैयालाल जी के परलोक-गमन के पश्चात वे संत शिरोमणि सतरामदास की गद्दी के विधिवत उत्तराधिकारी घोषित किए गए. शनै: शनै: उनके आध्यात्मिक प्रवचनों ने संत हजूरी रूप साधराम को विश्व-वंदनीय बना दिया. वे मुख्यतः प्रभु-स्मरण और ध्यान (मेडिटेशन) को ही मोक्ष प्राप्ति का मार्ग होने की शिक्षा दिया करते थे. जीवन भर उन्होंने अपनी मुख्य कर्मस्थली देवरी साहिब सहित कई देशों में जरूरतमंदों की इतनी सेवा की, जिस पर एक ग्रंथ लिखा जा सकता है. अपने अनुयायियों को भी वे जनसेवा के लिए प्रेरित करते थे. नागपुर से उन्हें विशेष स्नेह था. स्वयं मुझे भी व्यक्तिगत रूप से कई बार उस दैवीय व्यक्तित्व का अनमोल सानिध्य एवं आशीर्वाद प्राप्त हुआ है. उनके साथ बिताए गए अप्रतिम क्षण मेरे जीवन की अमूल्य निधि हैं. उनकी ज्योतिर्मय आत्मा को ईश्वर अपने श्रीचरणों में स्थान दें, यही प्रार्थना है.. ॐ शान्ति शान्ति शान्ति ॐ 

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