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मिश्रित अनुभूतियों का कोलाज : हमसफर जैसे दिन


ग़ज़लकार- माधुरी राऊलकर
समीक्षक- इन्दिरा किसलय
कृति- हमसफर जैसे दिन
प्रकाशन- प्रक्षेप प्रकाशन
मूल्य - 200/-
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हर तरफ दर्द  जब राहों में कालीन की तरह बिछा हो, वक्त के पांव में छाले पड़े हों, जब बेचैनियों को समेटकर दिन में चिराग जलाने की जरूरत महसूस हो, तब एक ग़ज़लकार से हुस्नो - इश्क के शेरों से पन्ने 
रंगने की बात कैसे की जा सकती है। जिंदगी के सारे रंग जब ग़ज़ल में समाने को बेचैन हों तब एक ही रंग को सर आँखों पर कैसे बिठाया जा सकता है। वर्तमान हिंदी ग़ज़ल दुष्यन्तकुमार से कहीं ज्यादा आक्रामक है ।वह घुमा फिराकर नहीं, सीधी धनुर्धरअर्जुन की भाँति मछली की आंख वेधती है ।उसका विषयगत विस्तार, क्षेत्रफल विशाल है ।नए मुहावरों के साथ दिल में उतर जाती है। दृष्टि नई, सूझ नई, लहज़ा नया। निरंतर बेचैन निगाहों का तस्करा करती है।

व्यवस्था ने किचन से संसद तक प्रतिरोध को जन्म दिया है। हमसफर जैसे दिन माधुरी राऊलकर की पचहत्तर गजलों का ताज़ा गुलदस्ता है। पहले उन्होंने फूलों का दामन थामा अब अधिकांश गजलों में माँ की याद है, ममता है ,धरती सी माँ ग़ज़लों में समाई है। घर को घर बनाकर रखती है माँ, सलीके से सजाकर रखती है माँ।। और एक और बानगी देखिए, - सुबह के सूरज के आदाब जैसी माँ। लगती है ममता के सैलाब जैसी माँ।। फूल, माँ, ग़ज़ल और नियति इन में सृष्टि का रहस्य समाया हुआ है। फूलों की कमनीयता रिश्तों की टूटन से उपजी टीस, कसक और जगत जीवन में उभरी हुई विद्रूपताएँ उनकी ग़ज़लों को स्मरणीय बनाती हैं।

नये विषय की खोज और बेचैन निगाहें उन्हें चुप नहीं रहने देतीं। वे हकीकत से वाबस्ता होती हैं। स्त्री विमर्श के सतही सवालों से अलग माधुरी एक बेहद सच्चा सवाल करती हैं जो उन्हें प्रदर्शन प्रिय ग़ज़लकारों से अलग करता है- मैंने अपने घर को मंदिर माना मगर कब रहूंगी इबादत जैसी मैं।। - कहने की ज़रूरत नहीं कि उनका यह इक्कीसवाँ गज़ल संग्रह मिश्रित अनुभूतियों का कोलाज है जहाँ सर्वहारा का दर्द है, कुछ शिकायतें भी हैं। हर दिन पहले दिन से अलग होता है तो ग़ज़ल का अंदाज़-ए-बयां भी अलग होता है ग़ज़ल कभी हमसफ़र जैसी तो कभी अजनबी शहर सी बेगानी लगती है, एक सा एहसास और उष्मा हर दिन नहीं होती।

माधुरी ने मन के हर कोने की पड़ताल की है। वे कहती हैं, नजर और नजरिए का मासूम सा फर्क है तुम कागज़ देखते हो, मैं किताब देखती हूँ। समूचे संग्रह में- चितेरे जैसे दिन, आईने को और दर्पण जैसे दिन ग़ज़लें अपनी छाप छोड़ जाती हैं ।खुद का इतना भाव भीना आकलन दुर्लभ है- कभी महकते गुलाब जैसी मैं, कभी टूटे हुए ख्वाब जैसी मैं।।
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अक्सर यही बात खलती है, जिंदगी क्यों इतना छलती है।। इस सवाल का जवाब मिलकर भी नहीं मिलता जीवन का सारांश जब वक्त सौंप जाता है, तो हथेलियों पर ग़ज़ल कुछ इस तरह आकार लेती है नियति अपना साक्षात्कार करवाती है। जिंदगी जब आईना दिखा देती है, अपना सारा गुरूर मिटा देती है! माधुरी की ग़ज़लें पूर्ववर्ती ग़ज़लों की तरह उम्मीद से कभी खाली नहीं होतीं। उनकी भाषा इतनी सरल है कि साधारण हिंदी का पाठक भी उसका भरपूर आनंद ले सकता है एक भरा पूरा आशावाद ग़ज़ल की दुनिया को आश्वस्त करता है- आंधियों से बचा ही सकते हैं और दीये जला ही सकते हैं।। प्रक्षेप प्रकाशन की यह वर्तिका पाठकों के अंतस को रौशनी से भर देगी। उजालों की सौगात देगी।
समाचार 8810289680526805612
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