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छिपा नहीं अब : डॉ. रुघवानी ने अनिवार्य प्री-मैरिटल थैलेसीमिया स्क्रीनिंग की मांग की


नागपुर। 8 मई, शुक्रवार को मनाए जाने वाले विश्व थैलेसीमिया दिवस के अवसर पर, प्रमुख बाल रोग विशेषज्ञ, थैलेसीमिया और सिकल सेल सोसाइटी ऑफ इंडिया के अध्यक्ष तथा महाराष्ट्र मेडिकल काउंसिल के प्रमुख डॉ. विंकी रुघवानी ने सरकार से अपील की है कि सभी युवाओं के लिए विवाह से पहले थैलेसीमिया की जांच अनिवार्य की जाए। उन्होंने जोर देकर कहा कि इससे देश में इस आनुवंशिक रक्त विकार के प्रसार को काफी हद तक कम किया जा सकता है।

 थैलेसीमिया एक वंशानुगत रक्त रोग है, जिसके लिए जीवनभर नियमित रक्त चढ़ाना और दवाइयों की आवश्यकता होती है। हालांकि उपचार सुविधाओं में पिछले कुछ वर्षों में सुधार हुआ है, लेकिन रोकथाम ही इसका सबसे प्रभावी और टिकाऊ समाधान है।

 भारत दुनिया में थैलेसीमिया के सबसे अधिक प्रभावित देशों में से एक है, जहां लगभग 2 लाख मरीज इस बीमारी के साथ जीवन जी रहे हैं और हर साल 10,000– 15,000 बच्चे थैलेसीमिया मेजर के साथ जन्म लेते हैं। इस स्थिति को मजबूत रोकथाम उपायों के जरिए काफी हद तक सुधारा जा सकता है, विशेष रूप से युवाओं के लिए विवाह से पहले अनिवार्य स्क्रीनिंग के माध्यम से, ताकि वे अपने थैलेसीमिया स्टेटस के बारे में जान सकें।

 डॉ. रुघवानी, जो थैलेसीमिया और सिकल सेल सोसाइटी ऑफ इंडिया नामक एक एनजीओ भी चलाते हैं, ने बताया कि उन्होंने इस संबंध में स्वास्थ्य मंत्रालय और भारत के राष्ट्रपति को पत्र लिखा है। उन्होंने समझाया, 'इस बीमारी की चुनौती यह है कि यह तभी प्रकट होती है जब व्यक्ति को यह जीन दोनों माता-पिता से मिलता है। यदि केवल एक माता-पिता से यह जीन मिलता है, तो व्यक्ति सामान्य रहता है, लेकिन वह इस जीन का वाहक बन जाता है, जो आगे उसकी संतान में जा सकता है, यदि उसका जीवनसाथी भी वाहक हो'।
 
उनकी यह अपील इस वर्ष के विश्व थैलेसीमिया दिवस की थीम ‘Hidden No More: Finding the Undiagnosed, Supporting the Unseen’ के अनुरूप है। केंद्र सरकार ने भी 2023 में शुरू किए गए नेशनल सिकल सेल एलिमिनेशन मिशन के तहत थैलेसीमिया उन्मूलन को एक लक्ष्य के रूप में शामिल किया है, लेकिन स्क्रीनिंग की संख्या अभी भी बहुत कम है।

 अपनी मांग के पीछे का तर्क बताते हुए डॉ. रुघवानी ने कहा, 'जिन व्यक्तियों में थैलेसीमिया का गुण (कैरियर) पाया जाता है, वे दूसरे कैरियर से विवाह करने से बच सकते हैं और सूचित प्रजनन निर्णय ले सकते हैं, जिससे इन बीमारियों से ग्रसित बच्चों के जन्म की संख्या कम होगी'। उनका मानना है कि इससे न केवल प्रभावित मरीजों के लिए उपलब्ध संसाधनों का बेहतर उपयोग किया जा सकेगा, बल्कि हमारे स्वास्थ्य तंत्र और समाज पर पड़ने वाला बोझ भी कम होगा।

उन्होंने आगे कहा, 'थैलेसीमिया केवल इलाज की चुनौती नहीं है, यह एक रोके जा सकने वाला सार्वजनिक स्वास्थ्य मुद्दा है'। उन्होंने यह भी जोड़ा कि यदि गर्भावस्था के दौरान नियमित रूप से स्क्रीनिंग की जाए, तो कैरियर दंपतियों की जल्दी पहचान की जा सकती है और उन्हें उचित जेनेटिक काउंसलिंग देकर इस बीमारी को अगली पीढ़ी में जाने से रोका जा सकता है।
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