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चिराग तले अंधियारा


अक्सर कहा जाता है,
चिराग तले अंधियारा।

लाइट में पढ़े थे कि 
शैडो क्या और कैसी रहती।
और वह प्रकाश की
स्थिति पर तय होती।

लेकिन दर्शन में 
शायद यह अंधियारा
प्रकाश की कमी से नहीं,
अहंकार से जन्म लेता है।
अहंकार में स्वयं के दोष नहीं दिखते
और अंधेरे नक्शी बुनने लगते

जब मनुष्य
दूसरों को राह दिखाने लगता है,
पर स्वयं को देखना छोड़ देता है,
तब चिराग के नीचे
अंधेरा बनने लगता है।

दुनिया को ज्ञान देना सरल है,
स्वयं को पहचानना कठिन।
दूसरों की भूल दिख जाती है,
अपनी छाया नहीं दिखती।
यही कारण है कि
कई बार
बहुत प्रकाश फैलाने वाले लोग भी
भीतर से अशांत रहते हैं।
क्योंकि प्रकाश बाहर गया,
भीतर नहीं उतरा।

सच्चा दीपक
पहले स्वयं को जलाता है,
फिर आसपास को प्रकाशित करता है।
और जहाँ अहंकार कम होता है,
वहाँ चिराग तले भी
धीरे-धीरे उजाला उतरने लगता है।

शायद आधुनिक प्रबंधन में 
इसे आउट ऑफ बॉक्स थिंकिंग
कहते है
स्टूडेंट्स को पढ़ाया जाता है
जब कहीं दोष न मिले 
तब स्वयं से शुरू करे,
अक्सर सॉल्यूशंस मिल जाएंगे।

आज के परिप्रेक्ष्य में कई 
राजनीतिक पार्टी
इस भाव के शिकार है।
चिराग कैसा भी रहे
स्वयं जलता है,
कष्ट झेलता है
लेकिन ये भूल जाता है
कि अपने तले ही
समस्याएं रहती है।
अगर चिराग तले अंधियारा रहता है
तो वो चिराग का दोष नहीं मान सकते।

जो मनुष्य
अपने भीतर उतरने का
साहस कर लेता है,
वही समझ पाता है कि
सच्चा परिवर्तन
दूसरों को बदलने से नहीं,
स्वयं को देखने से आरंभ होता है।

और शायद
चिराग तले अंधियारा
हमेशा शाप नहीं होता,
वह एक संकेत भी हो सकता है,
कि अब प्रकाश को
थोड़ा भीतर उतरना बाकी है।

एक विद्वान व्यक्ति
हर सभा में
लोगों को धर्म, नीति और 
चरित्र का ज्ञान देता था।

एक दिन
उसके घर के सेवक ने पूछा,
मालिक,
आप पूरी दुनिया को सुधारने निकले हैं,
पर आपके अपने घर में
लोग आपसे डरते हैं,
प्रेम नहीं करते… ऐसा क्यों?

उस दिन
पहली बार
विद्वान ने कोई उत्तर नहीं दिया।
शायद
उसे पहली बार
चिराग तले अंधियारा 
दिखा था।

- राजेन्द्र चांदोरकर (अनिकेत)
   नागपुर, महाराष्ट्र 
काव्य 5238945531692446071
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