ग़ज़ल..
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जाना है मंजिल की आख़िरी निशान तक।।
जहां समा गये बड़े से बड़े धुरंधर,
चलते हुए जाना है उसी मकान तक।।
दुनिया ने देखा वो डूबता हुआ मंजर, जिसकी
कभी पहुंच हुआ करती थी सबकी जुबान तक।।
रोजमर्रा की जुस्तजू से *मिश्र* फुरसत ही नहीं मिली,
बस काम करते चले गये थकान तक।।
जिंदगी भर गलतफहमी का शिकार होते चले गये,
सोचा भी न था एक दिन चले जायेंगे पड़ाव तक।।
अब हमने झोंक दिया है खुद को बहती हुयी नदिया में,
अब ले जाये हमें वो अपने आख़िरी बहाव तक।।
- रामनारायण मिश्र
नागपुर, महाराष्ट्र