प्रेम विरह की अग्नि
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हम तो हंसना भूल गए जीवन से टुटा नाता है
प्रेम में जीना प्रेम में मरना कसमें हमने खाई थी
मैं तेरे बिन जीना भूल गया और तुमने क्यों रुसवाई की।
प्रेम की अग्नि रात और दिन मुझको यूं जलती है
तेरी यादें मुझको हर पल तेरी याद दिलाती है
खूबसूरत वह दिन थे अपने हसीन वो तराने थे
क्या खता मुझसे हुई क्यों मुझसे तुम बेगाने हुए।
एक धारा से बहते थे हम क्यों दो नदी किनारे हुए
चलते हैं साथ-साथ पर क्यों एक दूसरे से हारे हुए
दिल में मेरे चाह बहुत है अभी भी तुम आ जाओ प्रिये
जीते जी तूमने हमको क्यों मौत की सजा सुनाई प्रिये।
आकर मुझको गले लगाओ कसूर मेरा बताओ प्रिये
जीने को मजबूर हूं मैं सत्य का भान करो प्रिये
प्रेम विरह की बेदी मेंअकेला ही हूं जल रहा
खता नहीं है मेरी कोई क्यों मैं प्रेम में तड़प रहा।
- मेघा अग्रवाल
नागपुर, महाराष्ट्र