इनर स्ट्रेंथ : भीतर की असली ताकत
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यह हमने देखा।
मन अटकता है,
यह भी समझ लिया।
अब सवाल यह है
फिर मन निकलता कैसे है?
हर इंसान के भीतर
एक जगह ऐसी होती है
जो न पूरी तरह बिखरती है,
न पूरी तरह रुकती है।
वही है-
इनर स्ट्रेंथ।
यह शोर नहीं करती,
घोषणा नहीं करती,
लेकिन जब जरूरत होती है,
तो चुपचाप खड़ी हो जाती है।
जब मन कहता है,
'नहीं हो पाएगा..'
और अंदर से
एक हल्की आवाज़ आती है-
'कोशिश कर'।
वही इनर स्ट्रेंथ है।
यह ताकत बाहर से नहीं आती,
यह भीतर से जागती है।
ना यह किताबों में मिलती है,
ना भाषणों में,
यह अनुभव से बनती है,
गिरकर उठने से बनती है।
हर बार जब आप
अपने ही डर के खिलाफ
एक छोटा सा कदम उठाते हैं,
यह ताकत
थोड़ी और मजबूत हो जाती है।
इनर स्ट्रेंथ का मतलब
यह नहीं कि आप कभी टूटेंगे नहीं,
बल्कि यह कि
टूटकर भी
खुद को फिर से जोड़ लेंगे।
यह नियंत्रण नहीं है,
यह निर्णय है।
यह पूर्णता नहीं है,
यह प्रयास है।
और यही
एंट्रोपी और इनरशिया के बीच
मनुष्य को अलग बनाता है।
जहाँ एंट्रोपी कहती है-
'बिखर जाओ..'
जहाँ इनरशिया कहती है-
'ऐसे ही पड़े रहो..'
वहीं इनर स्ट्रेंथ कहती है-
'उठो'।
यह आवाज़ धीमी होती है,
लेकिन सच्ची होती है।
समस्या यह नहीं है
कि हमारे पास ताकत नहीं है,
समस्या यह है
कि हम उसे सुनते नहीं हैं।
और जो सुन लेता है-
वह बदलना शुरू कर देता है।
क्योंकि-
ताकत बाहर नहीं ढूंढी जाती,
वह भीतर से निकाली जाती है।
और जब यह ताकत
नियमित हो जाती है,
अंदरूनी शक्ति अकेले पहाड़ काटती है,
अकेले पूरी टीम को विजयी बनाती
लाखों पेड़ लगाती
कई उजड़े तालाब फिर से
जल से भर देती,
अकेले पूरे देश को
सही जगह पहुंचाती है
और ये किसी को दिखती नहीं
लेकिन इस के परिणाम सब को दिखते।
- राजेन्द्र चांदोरकर.. (अनिकेत)
नागपुर, महाराष्ट्र
