जीवन का सुख-चैन छीनता अहंकार
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विश्व अहंकार जागरूकता दिवस विशेष 11 मई
भले ही हमने शारीरिक रूप से मानवी देह पाया है, लेकिन क्या हम इंसान है या इंसान कहलाने के पात्र है? आज के दौर में इंसान बनकर जीने वाले दुर्लभ होते जा रहे हैं। आइये पहले हम स्वयं से जानते है कि, इंसान किन्हें कहते हैं। दूसरों की खुशी में खुश होना, दूसरों के दुःख में दर्द महसूस होना, दूसरों भावनाओं को समझना, उसकी कद्र करना। अपने स्वार्थ को दूर रखकर हमेशा दूसरों के भलाई का ख्याल करना। देश और समाज के विकास के लिए तत्पर रहना, यथोचित हर संभव मदद करना, मानव कल्याण का जज्बा बनाये रखना। झूठे दिखावे से बचना, लोगों से ईर्ष्या भाव न करना। प्रकृति, पशु-पक्षियों और जंगल की रक्षा करना। जाती, धर्म, लिंग, क्षेत्र, भाषा, रंगरूप पर आधारित भेदभाव को न मानकर समस्त मानवी समाज को एक स्तर पर मानकर मानवी सेवा विकास को सर्वोपरि मानना। कथनी-करनी में अंतर न करना। नशाखोरी, भ्रष्टाचार, चरित्रहीन व्यवहार, अन्यों से दुर्व्यवहार, अपराध, भेदभाव से अलिप्त होकर सत्कर्मों को ही हमेशा प्राथमिकता देना। यह सभी इंसानियत की विशेषता है, जो इंसानो में होनी चाहिए। अगर ये सभी विशेषता हम में है, तो हम इंसान है, वर्ना जानवरों को भी लज्जित कर दे, ऐसे घृणात्मक कलंकित करनेवाली दुःखद घटनाएं तो हमारे आसपास रोजाना होती ही है और हम आँखे मूंदकर बुजदिल की जिंदगी काटते हैं।
हमारे आसपास के इस कलह भरे वातावरण में हर कोई झूट का मुखौटा पहनकर खुद को इंसान दिखाने का प्रयत्न कर रहा है और यही वातावरण अहंकार की भेट चढ़कर जीवन का सुकून छीन रहा हैं। आज रिश्ते-नाते, शादियां तोड़ने में अहंकार मुख्य भूमिका में हैं। दुनिया को बताने के लिए कारण कुछ भी बताये लेकिन आज विभिन्न देशों में चल रहे युद्ध का कारण अहंकार भी है, जिससे बड़ी मात्रा में मासूमों की जान जा रही है, पर्यावरण, धन का अपव्यय हो रहा है और पूरी दुनिया पर इसका गंभीर असर हो रहा हैं। अनेक बार रिश्तेदार, आस-पडोसी, परिचित अहंकार के कारण जिंदगी भर बात नहीं करते, उससे ज़िंदगी में क्या हासिल हो जाता है, पता नहीं।
क्या आप जानते है कि, जब भी हम क्रोध, चिढ़, ईर्ष्या, तनाव या बुरे विचारों से भर उठते है, तब उसका सीधा असर हमारे खुद के ही स्वास्थ्य पर गंभीर असर करता है, अर्थात दूसरों पर गुस्सा करना हमारे जान को जोखिम में डालता हैं। आजकल तो नाम के लिए या दिखावे के लिए हम खूब आधुनिक होने का दम भरते है, लेकिन विचारों और संस्कारों से हम लगातार पिछड़ते ही जा रहे हैं। राह चलते हुए गलती से किसी को धक्का भी लग जाये तो, इंसानियत दिखाने के बजाय गालीगलौच, धमकी, धौस दिखाकर खुद के वर्चस्व को साबित करने की होड़ लग जाती है फिर बात मारपीट और कई बार हत्या तक पहुंच जाती हैं। हमारे रिश्ते-नाते, आस-पड़ोस या परिचित में किसी के घर कोई खुशखबर हो तो हम मन के मन में जलन से भरते है, लोगों की मेहनत को नजरअंदाज करके खुद की किस्मत को कोंसते है, कि दूसरों के साथ क्यों अच्छा होता है, हमारे साथ क्यों नहीं। झूठा दिखावा और खुद का स्टैंडर्ड ऊंचा दिखाने के चक्कर में अक्सर बर्बादी के मुहाने में पहुँच जाते है, ये आज के समाज का घिनौना सच हैं। मनुष्य का अहंकार उसका सुख-चैन छीन लेता है और सुंदर शांत जीवन का मार्ग दुर्गम बना देता हैं। अहंकार मनुष्य के जीवन को विनाश की ओर धकेलता है, जैसे मनुष्य खुद ही अपनी मौत के लिए चिता सजा रहा हैं।
हमारे आसपास बहुत से बुरे घटनाओं से अनगिनत लोगों के दुःखद अंत की खबरें हमें झंझोड़ देती है, उदाहरण के लिए आज बहुत से अभिभावक बच्चों को विदेश भेजते है या बड़े शहरों में भेजते है और अहंकार से गर्वित होते है कि उनके बच्चे विदेशों में स्थायिक हो चुके है, परंतु अनेक बार ये ही बूढ़े माँ-बाप मर भी जाते है, फिर भी उनके बच्चे अंतिम संस्कार में उपस्थिति दर्शाना भी मुनासिब नहीं समझते, ये हमारे समाज की कड़वी सच्चाई हैं। दुनिया भर में हजारों ऐसे महान शख्सियत है जो नाम, शोहरत, रुतबा, पैसा होने के बावजूद सरल और सादगी पसंद जीवन यापन करते हैं, अनेक महान लोग दुनिया से चले जाने के बाद उनकी जिंदगीभर की कमाई में केवल कुछ जोड़ी कपड़े और किताबों का संग्रह देखने मिलता है, थोड़ी-बहुत संपत्ति होती भी है तो वे उसे दान कर चुके होते है, जबकि वे चाहते तो करोडो, अरबों रुपयों की संपत्ति बना सकते थे, लेकिन तब वे शायद अपने कर्मों से महान नहीं बन पाते।
अहंकार अक्सर हमारी झूठी आत्म-छवि को बचाने के लिए असलियत को तोड़-मरोड़ देता है, जिससे गलतियाँ मानना या आलोचना स्वीकार करना मुश्किल हो जाता है, अहंकार अगर हावी हो जाये तो खुद को सही साबित करने में लग जाते है, जिससे टकराव उत्पन्न होता हैं। अहंकार में मनुष्य खुद को महान या सर्वगुण संपन्न समझता है जिससे दूसरों के प्रति हीन भावना उत्पन्न होती हैं। अहंकार हमें दूसरों की राय और भौतिक सफलता की बहुत ज़्यादा परवाह करने पर मजबूर करता है, जिससे हमें चिंता और नाखुशी होती है, जीवन में उदासी छाती हैं। इससे लोग अच्छा करने के बजाय अच्छा दिखने को या शॉर्टकट लेने को प्राथमिकता देना पसंद करते हैं। अहंकार ज़िंदगी पर गहरा असर डालता है, बढ़ा हुआ अहंकार कुछ नया सीखने में रुकावट डालता है, हार होने के डर से विकास को रोकता है, और लगातार अन्यों से तुलना करके दुखी महसूस करता है, जबकि हमारे नियंत्रण में अहंकार हो तो अपनी शान बढ़ाने के बजाय हम खुद को बेहतर बनाने की कोशिश पर ध्यान केंद्रित करते है, जिससे समायोजित करने की क्षमता, गहरे रिश्ते और उत्पादकता बढ़ती हैं।
खुद को समझने के लिए अपने कार्य, व्यवहार, स्वभाव और इसका अन्यों पर असर इन सभी बातों का आत्मचिंतन करना बहुत जरुरी है, खुद का विश्लेषण करने के लिए समय निकालें और उन क्षेत्रों की पहचान करें जहाँ हमारा अहंकार हमारे निर्णयों और बातचीत को प्रभावित कर रहा हो। जीवन में सबसे जरूरी शुद्ध हवा, स्वच्छ जल, पोषक आहार है, और मन को संतोष है तो जीवन सुख से बीतता है, लेकिन लोग इसे प्राथमिकता देने के बजाय अहंकार, झूठा दिखावा और घमंड में सुकून खो बैठते हैं। लोग आज के दौर में, घर के आगे कोई पेड़ हो तो उसे काटकर वहां अतिक्रमण करना चाहते है, ताकि घर का दायरा बढ़ाया जा सकें, लेकिन ऐसी सोच ने पुरे देश में तापमान बढ़ाया है, यह किसी को नजर नहीं आता, हर कोई स्वार्थ के लिए जीते हुए प्रतीत होता हैं। स्वार्थ से अपना ध्यान हटाकर समाधानी सोच अपनायें। विनम्रता और सीखना अपनाएँ, मानें कि हमको सब कुछ नहीं पता।
सफलता के लिए नतीजों पर नहीं, कोशिश पर ध्यान दें। “मैं हमेशा ही सही हूँ” वाली सोच छोड़ दें। अपना ध्यान अपनी चिंताओं से हटाकर दूसरों की सेवा करने पर लगाएँ, सत्कर्म करें। रोजाना ध्यान, योग या शांत सोच-विचार के लिए समय निकालें। अच्छे विचारों के लोगों से जुड़े, हेल्दी हॉबी अपनाएं, प्रकृति की रक्षा प्रत्येक की जिम्मेदारी समझें। महान समाजसुधारकों के आदर्श, सोच को जीवन में अपनाएं। अच्छे काम करने का सुकून दुनिया में बेशकीमती है, छोटी सी जिंदगी है इसे तनावमुक्त रहकर हंसते मुस्कुराते हुए बिताएं। ‘अहंकार एक धीमा जहर है, जो इंसान के गुणों को मार देता हैं’।
- डॉ. प्रितम भि. गेडाम
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