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ठहराव


ठहर जाना
और
ठहराव
दोनों सुनने में भले ही 
एक जैसे लगते हैं,
पर दोनों में
आकाश-पाताल का अंतर है।

ठहर जाना
थकान के बाद आता है।
अक्सर हार के बाद आता है,
डर के बाद आता है,
जहाँ कदम रुक जाते हैं,
पर भीतर बेचैनी चलती रहती है।

लेकिन ठहराव…
वह तो साधना है।
वह नदी का शांत होना है,
ताकि वह अपनी गहराई देख सके।

ठहर जाना
मनुष्य को रोक देता है,
वही ठहराव
मनुष्य को समझ देता है।
ठहर जाना
जीवन से भागना भी हो सकता है,
पर ठहराव
जीवन को ध्यान से देखना होता है।

कभी-कभी
तेज़ भागते हुए लोग
बहुत दूर निकल जाते हैं,
लेकिन कहाँ जाना था
यही भूल जाते हैं।
तब जीवन
धीरे से कहता है—
'रुको नहीं…
बस थोड़ा ठहरो'।
क्योंकि
हर विराम हार नहीं होता,
कुछ विराम
अगली ऊँचाई की तैयारी भी होते हैं।

ठहरा हुआ आदमी
अक्सर इरिटेट करता है,
चिढ़ाता है,
क्योंकि वह सिर्फ रुका नहीं होता,
भीतर से जाम हो चुका होता है।
क्योंकि वह
न स्वयं आगे बढ़ता है,
न दूसरों को बढ़ने देता है।
उसके भीतर
शिकायतें जमा होती रहती हैं,
तुलनाएँ पलती रहती हैं,
और जीवन
धीरे-धीरे बोझ बन जाता है।

लेकिन
ठहराव वाला आदमी…
वह अलग होता है।
उसके पास शांति होती है,
सुनने की क्षमता होती है,
प्रतिक्रिया नहीं,
समझ होती है।
उसके पास बैठो
तो लगता है
जैसे भीतर का शोर
धीमा पड़ गया हो।
वह भागता कम है,
समझता ज्यादा है।
इसीलिए
वह सहारा बन जाता है।

ठहरा हुआ व्यक्ति
समय रोक देता है,
ठहराव वाला व्यक्ति
क्षण को अर्थ दे देता है।

ठहराव वाला आदमी…
 भी शांत दिखता है,
पर उसकी शांति मृत नहीं होती।
वह भीतर बहुत दूर तक
चलकर आया होता है।
उसने शब्दों के शोर से निकलकर
मौन का अर्थ समझा होता है।
उसके पास बैठो
तो वह तुम्हें
सलाह कम देता है,
स्थान ज्यादा देता है।
वह तुम्हें धक्का देकर
बदलना नहीं चाहता,
बस इतना करता है
कि तुम स्वयं को
थोड़ा साफ़-साफ़ देखने लगते हो।

ठहरा हुआ व्यक्ति
ऊर्जा खींच लेता है,
ठहराव वाला व्यक्ति
ऊर्जा लौटा देता है।
एक के पास
अधूरी लड़ाइयों का धुआँ होता है,
दूसरे के पास
स्वीकार का उजाला।
इसीलिए
एक आदमी से मिलकर
मन थक जाता है,
और दूसरे से मिलकर
मन घर लौट आता है।

परिस्थिति
हर बार नहीं बदलती।
कई बार
वही दर्द रहता है,
वही लोग,
वही संघर्ष,
वही अधूरी प्रतीक्षाएँ।
लेकिन
ठहराव…
परिप्रेक्ष्य बदल देता है।
भागते हुए मन को
हर समस्या
पहाड़ लगती है,
पर जब मन
थोड़ा ठहरता है,
तो वही पहाड़
रास्ता भी दिखाने लगता है।
ठहराव
परिस्थिति से भागना नहीं,
उसके सामने
बिना टूटे खड़े रहना है।
क्योंकि
अशांत मन
हर दिशा में
शत्रु खोज लेता है,
और शांत मन
उसी दिशा में
संकेत देखने लगता है।
परिस्थिति वही रहती है,
लेकिन देखने वाला बदल जाए
तो अर्थ बदल जाते हैं।

जैसे
बरसात में
किसी को कीचड़ दिखता है,
किसी को अन्न।
किसी को
अंधेरा डराता है,
किसी को
तारे दिखाई देते हैं।
ठहराव
शायद यही करता है—
दुनिया नहीं बदलता,
दुनिया को देखने की
आँख बदल देता है।

जो लोग
भीतर से थके हुए होते हैं,
उन्हें दूसरों की रफ्तार
अक्सर खलती है।
क्योंकि
वे सिर्फ सामने वाले को
आगे बढ़ते नहीं देखते,
अपना रुक जाना भी
महसूस करते हैं।
फिर
दूसरों की चमक
प्रेरणा कम,
चुभन ज़्यादा बन जाती है।
लेकिन
जिसने भीतर
ठहराव पाया हो,
उसे किसी की गति
परेशान नहीं करती।
वह जानता है
कि हर व्यक्ति की यात्रा,
उसकी थकान,
उसका समय
अलग होता है।
ठहरा हुआ आदमी
दूसरों की उड़ान से
बेचैन होता है,
और ठहराव वाला आदमी
दूसरों की उड़ान देखकर भी
शांत रहता है।
क्योंकि
एक भीतर से खाली होता है,
दूसरा भीतर से स्थिर।

ठहराव का
शायद सबसे सुंदर उदाहरण
पृथ्वी है।
वह अपनी धुरी पर
करीब १०५० मील प्रति घंटे की गति से
घूम रही है,
सूर्य के चारों ओर
और भी तेज़ दौड़ रही है,
फिर भी
हमें स्थिर लगती है।
यही तो ठहराव है।
गति का रुक जाना नहीं,
गति में भी
संतुलन बने रहना।
बाहर
अत्यधिक चलन,
भीतर
पूर्ण व्यवस्था।
इसीलिए
सच्चा ठहराव
निष्क्रियता नहीं होता।
वह ऐसी स्थिरता है
जो गति के बीच भी
विचलित नहीं होती।
मनुष्य भी
यदि भीतर से संतुलित हो जाए,
तो जीवन की
असंख्य परिक्रमाओं के बीच
शांत रह सकता है।

तो थोड़ा ठहर कर सोचिए
की ठहरना है
या ठहराव की ओर बढ़ना है

- राजेन्द्र चांदोरकर (अनिकेत)
   नागपुर, महाराष्ट्र 
काव्य 6515168122262514851
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