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बकरीद : त्याग, करुणा और इंसानियत का असली अर्थ

                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                         


भारतीय समाज में त्योहार केवल उल्लास के अवसर नहीं होते, वे हमारी सांस्कृतिक चेतना, नैतिक मूल्यों और मानवीय रिश्तों की पुनर्स्मृति भी होते हैं। हर पर्व अपने साथ कोई न कोई गहरी सीख लेकर आता है। कोई त्योहार आनंद सिखाता है, कोई कृतज्ञता, कोई एकता, तो कोई आत्ममंथन। ईद-अल-अधा, जिसे आम बोलचाल में बकरीद कहा जाता है, ऐसा ही एक पर्व है जो केवल धार्मिक अनुष्ठान का दिन नहीं, बल्कि त्याग, समर्पण, करुणा और सामाजिक उत्तरदायित्व का गहरा संदेश देता है। आज के समय में त्योहारों का स्वरूप कई बार बाहरी दिखावे तक सीमित होता जा रहा है। नए कपड़े, सजावट, पकवान और औपचारिक शुभकामनाएँ ही मानो उत्सव का अर्थ बनते जा रहे हैं। ऐसे समय में बकरीद हमें याद दिलाती है कि किसी भी पर्व की असली आत्मा बाहरी प्रदर्शन में नहीं, बल्कि भीतर जागने वाले मूल्यों में होती है।
बकरीद की प्रेरणा इस्लामी परंपरा की एक अत्यंत मार्मिक घटना से जुड़ी है। ईश्वर की इच्छा के सामने पूर्ण समर्पण का परिचय देते हुए इब्राहिम ने अपनी सबसे प्रिय वस्तु का भी त्याग करने की तैयारी दिखाई। यह कथा केवल धार्मिक आख्यान भर नहीं है। इसके भीतर एक शाश्वत मानवीय प्रश्न छिपा है, मनुष्य अपने स्वार्थ से ऊपर उठकर बड़े मूल्यों के लिए कितना तैयार है? आज यही प्रश्न हमारे समय के सामने भी खड़ा है। हम विकास की बातें करते हैं, आधुनिकता का उत्सव मनाते हैं, प्रगति के दावे करते हैं; लेकिन त्याग की भाषा कितनी बोलते हैं? हम अधिकारों की मांग करते हैं; पर जिम्मेदारी का बोध कितना रखते हैं? हम अपने सुख के पीछे दौड़ते हैं, लेकिन दूसरों के दुःख में कितनी देर ठहरते हैं?

        बकरीद का असली संदेश यहीं से शुरू होता है।इस पर्व का केंद्र है, कुर्बानी। लेकिन कुर्बानी का अर्थ केवल एक धार्मिक कर्मकांड तक सीमित कर देना उसके मर्म को छोटा कर देना होगा| असली कुर्बानी है अहंकार का त्याग, लोभ का त्याग, अन्यायपूर्ण प्रवृत्तियों का त्याग, स्वार्थ का त्याग। दूसरे के हित के लिए अपने हिस्से की कुछ सुविधा छोड़ देना ही कुर्बानी का सच्चा अर्थ है। आज समाज में तनाव बढ़ रहे हैं। धर्म, जाति, भाषा, क्षेत्र और विचारधाराओं के नाम पर नई-नई दीवारें खड़ी हो रही हैं। संवाद कम हो रहा है, संशय बढ़ रहा है और सहअस्तित्व की भावना कमजोर पड़ रही है। ऐसे समय में बकरीद का संदेश और अधिक प्रासंगिक हो जाता है। क्योंकि यह पर्व बताता है कि आस्था केवल व्यक्तिगत भक्ति नहीं होती; उसे सामाजिक करुणा से भी जुड़ना चाहिए।

        बकरीद का एक अत्यंत महत्त्वपूर्ण पक्ष है वितरण की भावना। कुर्बानी के बाद उसके हिस्से को गरीबों, जरूरतमंदों और वंचितों तक पहुँचाने की परंपरा केवल धार्मिक विधि नहीं, बल्कि सामाजिक न्याय की जीवंत चेतना है।आज दुनिया में संपत्ति बढ़ रही है, लेकिन विषमता भी बढ़ रही है। ऊँची-ऊँची इमारतों की छाया में आज भी खाली पेटों की कमी नहीं है। विकास की चमक के साथ बेरोजगारी, महँगाई, असुरक्षा और उपेक्षा का अँधेरा भी मौजूद है। ऐसे समय में बकरीद हमें बताती है कि उत्सव तभी पूर्ण होता है, जब हमारे आनंद में दूसरों का भी हिस्सा हो| समाज केवल कानूनों से नहीं चलता; वह संवेदनाओं से भी चलता है। संविधान समानता का मार्ग दिखाता है, लेकिन करुणा उस मार्ग पर चलने की नैतिक शक्ति देती है।आज सार्वजनिक जीवन में संवेदनशीलता का अभाव तीखे रूप में दिखाई देता है। राजनीति में कटुता बढ़ रही है, सार्वजनिक संवाद में शालीनता कम हो रही है और सामाजिक माध्यमों पर अपमान की भाषा सामान्य बनती जा रही है। दूसरे के दुःख को महसूस करने की क्षमता घट रही है। ऐसे वातावरण में बकरीद का संदेश केवल एक समुदाय तक सीमित नहीं रहता; वह पूरे समाज के लिए नैतिक पाठ बन जाता है। यह पर्व हमें याद दिलाता है धर्म का सच्चा अर्थ विभाजन में नहीं, इंसानियत में है।

        भारत की सबसे बड़ी शक्ति उसकी विविधता है। यहाँ ईद-अल-अधा, दिवाली, ख्रिसमस और बुद्ध पूर्णिमा केवल कैलेंडर के दिन नहीं हैं बल्कि वे परस्पर सम्मान और सहअस्तित्व की संस्कृति के प्रतीक हैं। इस देश की ताकत एकरूपता में नहीं, बल्कि अनेकता से निर्मित एकता में है। इसीलिए बकरीद के अवसर पर एक बात विशेष रूप से समझनी चाहिए धर्म के बाहरी रूप को समझना आसान है, लेकिन उसके भीतर छिपे मानवीय संदेश को समझना कहीं अधिक आवश्यक है। बकरीद का वह मानवीय संदेश बहुत स्पष्ट है त्याग करो, बाँटो, दूसरों के दुःख में सहभागी बनो और ईश्वर के सामने विनम्र रहो। आज की पीढ़ी उपभोगवाद के तीव्र आकर्षण में जी रही है। सफलता की परिभाषा कई बार धन, प्रतिष्ठा और भौतिक उपलब्धियों तक सीमित हो गई है। प्रतिस्पर्धा है, भागदौड़ है, तुलना है और असुरक्षा भी है। ऐसे समय में बकरीद एक अलग सवाल पूछती है तुम्हारे पास कितना है, यह महत्वपूर्ण नहीं; तुम कितना बाँट सकते हो, यह अधिक महत्त्वपूर्ण है। यही नैतिक ऊँचाई है।

      इस पर्व के अवसर पर परिवार, रिश्तेदार, पड़ोसी और मित्र एक-दूसरे से मिलते हैं। शुभकामनाएँ दी जाती हैं। लेकिन इन मुलाकातों के पीछे एक बड़ा सामाजिक अर्थ छिपा है | रिश्तों का पुनर्जीवन। आज मनुष्य डिजिटल रूप से जुड़ा हुआ है, लेकिन भावनात्मक रूप से कई बार अकेला है। घरों में लोग हैं, पर संवाद कम है। समाज में भीड़ है, पर निकटता कम है। ऐसे समय में त्योहार रिश्तों को फिर से गर्माहट देने का अवसर बनते है | बकरीद यह भी सिखाती है कि आस्था और विवेक एक-दूसरे के विरोधी नहीं हैं। सच्ची आस्था मनुष्य को अधिक विनम्र, अधिक न्यायप्रिय और अधिक करुणामय बनाती है। यदि धर्म मनुष्य को दूसरे से घृणा करना सिखाए, तो वह धर्म का आत्मा नहीं, उसका विकृत रूप है।

      आज दुनिया को सबसे अधिक आवश्यकता किस चीज़ की है? परस्पर विश्वास की। धर्म के नाम पर फैलते तनाव, सोशल मीडिया पर बढ़ता द्वेष, अफवाहों से पैदा होती बेचैनी इन सबके बीच बकरीद का संदेश और अधिक अर्थपूर्ण हो उठता है। क्योंकि यह पर्व याद दिलाता है कि सच्ची धार्मिकता मनुष्य को दूसरों से दूर नहीं करती; वह उसे और करीब लाती है। इस अवसर पर समाज को स्वयं से कुछ प्रश्न भी पूछने चाहिए। क्या हमारे आनंद में दूसरों का हिस्सा है? क्या हमारी आस्था में करुणा है? क्या हमारी समृद्धि में सामाजिक जिम्मेदारी है? और सबसे महत्त्वपूर्ण क्या हमारे धर्म में इंसान मौजूद है? ये प्रश्न केवल दर्शन के नहीं हैं; ये लोकतांत्रिक समाज के नैतिक स्वास्थ्य से जुड़े प्रश्न हैं।

        बकरीद का उत्सव केवल सजावट, औपचारिक शुभकामनाओं या रस्मों तक सीमित नहीं रहना चाहिए। उसे हमारे व्यवहार में उतरना चाहिए। यदि इस दिन हम किसी जरूरतमंद की मदद करें, किसी भूखे तक भोजन पहुँचाएँ, किसी टूटे रिश्ते को जोड़ें, किसी पूर्वाग्रह को मन से निकाल दें तभी इस पर्व की आत्मा सचमुच जीवित रहेगी। अंततः बकरीद का संदेश बहुत सरल है, पर उतना ही गहरा भी। इंसानियत से बड़ा कोई धर्म नहीं। ईद-अल-अधा के इस पावन अवसर पर आइए संकल्प लें कि आस्था हो, तो उसमें विनम्रता भी हो; समृद्धि हो, तो उसमें साझेदारी भी हो; मतभेद हों, तो वैर न हो।क्योंकि अंततः कोई समाज अपनी संपत्ति से महान नहीं बनता, बल्कि अपनी संवेदनशीलता से महान बनता है। बकरीद की सभी को हार्दिक शुभकामनाएँ। त्याग की भावना, करुणा की ऊष्मा और इंसानियत का उजाला हमारे समाज को और अधिक मानवीय बनाता रहे, यही मंगलकामना।
करुणा से बड़ी कोई इबादत नहीं। और बाँटने से बड़ा कोई उत्सव नहीं।

- प्रविण बागडे
   नागपुर, महाराष्ट्र 
   भ्रमणध्वनी : 9923620919
लेख 964486485109717746
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