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जिन्दगी के क्षण


मध्य रात्रि होने जा रही थी,
हवा भी सुनसान हो रही थी,
जिंदगी ने अपना राग गाया
वातावरण को इस तरह बनाया। 
लेखनी को बल मिला
मुझे मजबूर किया।
वाह रे तू  जिंदगी।

अभी तक क्या गीत नही गाया 
कया से कया तूने मुझे बनाया।
तू मुझसे खिलवाड करती है,
बेरहमी से वार करती है,
जब आयी थी मुझे नही बताया,
क्या क्या जुलम तूने 
मुझ पर नही ढाया।

तेरी भी अजिब दास्तान  है
तेरी मौजूदगी के अमिट निशान है।
समझ नही आ रहा है,
तू कया गुल खिलायेगी
मुझसे अलग होकर 
कया गीत गायेगी।
मेरी भी सुन लेना
जिनदगी के कुछ साल बाकी है 
हंसते बिता देना।

बहुत मुश्किल से तुझे पाया है, 
इसमे तेरा कोई  शेयर नही है। 
मैने भी कुछ अच्छा किया था,
तब तुझे पाया है।

मैने देखा, रात एक बजा रही थी।
जिनदगी भी कुछ गुनगुना रही थी।
हर पल असर दिखा रही थी
जिनदगी तू बहुत लंबी है
लगता है अभी अभी  मिली है।
अब मै सो रहा हूं
जिंदगी  के सपनो मे खो रहा हूं

पो फटते फिर मिलूंगा
फिर वही राग गाऊंगा,
वाह रे तू जिंदगी 
तेरी भी अजिब कहानी है
हर क्षण हर दिन तेरी 
अमिट निशानी है।
तेरी अमिट निशानी है।
वाह वाह रे तू जिदंगी 
वाह रे तू जिनदगी। 

 - जयप्रकाश सूर्यवंशी 'किरण' 
    साकेत नगर, नागपुर
समाचार 3259915273481757001
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