माँ केवल जन्म नहीं देती, वह हर दौर में बच्चों का भविष्य भी गढ़ती है : निशा चावला
https://www.zeromilepress.com/2026/05/blog-post_875.html
मदर्स डे पर विशेष
'1980 की माँ त्याग की मिसाल थी, और आज की माँ संघर्ष के साथ आत्मनिर्भरता की पहचान है'।
माँ का स्थान हर युग में सबसे ऊँचा माना गया है। समय के साथ समाज, परिवार और जीवनशैली में बहुत परिवर्तन आए, जिनका प्रभाव माँ की भूमिका पर भी पड़ा। 1980 के पहले की माँ और आज की माँ के जीवन में काफी अंतर दिखाई देता है, लेकिन दोनों का उद्देश्य एक ही रहा - अपने बच्चों और परिवार का सुख। 1980 के पहले के समय में माँ का जीवन पूरी तरह परिवार तक सीमित होता था।
उस दौर की माँ घर के सभी कार्य स्वयं करती थी। बच्चों की परवरिश, संस्कार, भोजन, रिश्तों को संभालना - यही उसकी दुनिया थी। उस समय सुविधाएँ कम थीं, लेकिन परिवार में अपनापन और साथ अधिक था। माँ त्याग और सहनशीलता की प्रतिमा मानी जाती थी। वह अपने बच्चों के लिए हर कठिनाई सह लेती थी, बच्चों के दुख अपने आंचल में छुपा लेती और सुख की छांव देती थी, लेकिन अपनी भावनाओं को अक्सर दबा देती थी। इसके बाद के दशकों में समाज तेजी से बदला। शिक्षा और तकनीक के विकास के साथ महिलाओं ने घर के बाहर भी अपनी पहचान बनानी शुरू की।
आज की माँ केवल गृहिणी नहीं, बल्कि एक कामकाजी महिला, शिक्षिका, डॉक्टर, अधिकारी और समाज की मजबूत स्तंभ बन चुकी है। वह घर और नौकरी दोनों जिम्मेदारियों को संतुलित करती है। अपने आपको भी पंख दिए और अपने बच्चों को भी पंख की छांव के साथ पंखों के साथ उड़ना सिखाया। आज की परिस्थिति में माँ को कई चुनौतियों का सामना करना पड़ता है। बच्चों पर मोबाइल और सोशल मीडिया का प्रभाव बढ़ गया है। संयुक्त परिवार कम हो गए हैं, जिससे माँ पर जिम्मेदारियाँ और बढ़ गई हैं। फिर भी आज की माँ अपने बच्चों को अच्छे संस्कार, शिक्षा और आत्मविश्वास देने का पूरा प्रयास करती है।
हालाँकि समय बदल गया है, लेकिन माँ का प्रेम कभी नहीं बदलता। पहले की माँ त्याग की मूर्ति थी और आज की माँ संघर्ष और आत्मनिर्भरता की मिसाल है। दोनों ही रूपों में माँ परिवार की सबसे मजबूत नींव रही है। सिर्फ यह कि फ्रीडम ओर प्राइवेसी ने मां बाप को बच्चों को अलग कर दिया है। विचारों और जनरेशन दूरी कुछ ज्यादा है। तभी बच्चे विदेशों में ओर मां पिता अपने देश में रह जाते है।
अंत में यही कहा जा सकता है कि माँ हर दौर में विशेष रही है उसके बिना परिवार और समाज की कल्पना अधूरी है।
आज की सबसे गंभीर स्थिति यह है कि माँ सबकी चिंता करती है, लेकिन उसकी चिंता करने वाला बहुत कम होता है। वह भावनात्मक रूप से मजबूत दिखती है, पर अंदर ही अंदर कई परेशानियों से गुजरती रहती है। हमें समझना चाहिए कि माँ केवल जिम्मेदारी निभाने वाली व्यक्ति नहीं, बल्कि पूरे परिवार की आत्मा होती है। उसका सम्मान, प्रेम और साथ देना हर बच्चे और परिवार का कर्तव्य है।
'माँ घर की वह रोशनी है, जो खुद जलकर पूरे परिवार को उजाला देती है'।
- निशा चावला
(मोटिवेशनल स्पीकर)
नागपुर, महाराष्ट्र
