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तपती धरती की पीड़ा और बढ़ता जल संकट


मई महीने के अंतिम दिनों में देश के अनेक हिस्सों में तापमान 46 से 47 डिग्री सेल्सियस तक पहुंच गया और ऐसा प्रतीत होने लगा मानो सूर्य पृथ्वी के और अधिक निकट आ गया हो। शरीर को झुलसा देने वाली इस भीषण गर्मी के पीछे केवल ऋतुचक्र ही जिम्मेदार नहीं है, बल्कि मानव हस्तक्षेप से बिगड़ा पर्यावरण भी उतना ही उत्तरदायी है। अंधाधुंध वृक्षों की कटाई, तेजी से बढ़ता कंक्रीटीकरण, औद्योगीकरण से बढ़ता कार्बन उत्सर्जन, जलाशयों का सिकुड़ना तथा जलवायु परिवर्तन के बढ़ते प्रभावों के कारण पृथ्वी का प्राकृतिक संतुलन लगातार बिगड़ रहा है। परिणामस्वरूप वर्षा का चक्र अनियमित होता जा रहा है, जिससे कहीं अतिवृष्टि तो कहीं भीषण सूखे जैसी विरोधाभासी परिस्थितियां उत्पन्न हो रही हैं। प्रकृति के इस बदलते स्वरूप ने जल संकट को और भी गंभीर बना दिया है तथा आज यह देश के सामने खड़ी सबसे बड़ी चुनौतियों में से एक बन चुका है।

जीवन का आधार जल दिन-प्रतिदिन दुर्लभ होता जा रहा है। नदियां, तालाब, कुएं और भूजल स्रोत तेजी से सूख रहे हैं, जबकि दूसरी ओर वर्षा का करोड़ों लीटर पानी उचित प्रबंधन के अभाव में समुद्र में बह जाता है। शहरों में लोगों को पानी के लिए टैंकरों पर निर्भर रहना पड़ रहा है, वहीं ग्रामीण क्षेत्रों में महिलाओं और किसानों को पानी के लिए संघर्ष करना पड़ रहा है। बढ़ती जनसंख्या, कृषि और उद्योगों के लिए भूजल का अनियंत्रित दोहन तथा जल प्रदूषण इस समस्या को और विकराल बना रहे हैं। जल संसाधनों का विवेकपूर्ण उपयोग, वर्षा जल संचयन, सूक्ष्म सिंचाई पद्धतियों का अपनाना तथा जल स्रोतों का संरक्षण ही इस संकट का दीर्घकालिक समाधान है। पानी की प्रत्येक बूंद भविष्य के जीवन की गारंटी है, यह चेतना समाज के प्रत्येक व्यक्ति तक पहुंचना आज समय की सबसे बड़ी आवश्यकता बन गई है।

इसी पृष्ठभूमि में आगामी 5 जून को मनाया जाने वाला विश्व पर्यावरण दिवस और भी अधिक महत्वपूर्ण हो जाता है। यह दिन केवल औपचारिक वृक्षारोपण या घोषणाओं का अवसर नहीं, बल्कि प्रकृति के साथ अपने संबंधों को पुनः मजबूत करने का संकल्प दिवस है। जब पृथ्वी का तापमान बढ़ रहा है, जल स्रोत सूख रहे हैं और पर्यावरणीय संकट गहराता जा रहा है, तब प्रत्येक नागरिक के लिए पर्यावरण संरक्षण की जिम्मेदारी स्वीकार करना अनिवार्य हो गया है। एक पेड़ लगाना, पानी बचाना, प्लास्टिक का उपयोग कम करना और प्राकृतिक संसाधनों का संयमित उपयोग करना ही सच्ची पर्यावरण पूजा होगी। क्योंकि यदि हम आज पर्यावरण की रक्षा करेंगे, तभी आने वाली पीढ़ियां सुरक्षित, समृद्ध और जल-संपन्न भारत का सपना देख सकेंगी। (पानी बचाओ, पर्यावरण बचाओ और पृथ्वी का भविष्य सुरक्षित बनाओ) यही संदेश आज के समय का सबसे बड़ा लोकधर्म बन गया है।

- दिवाकर मोहोड           
   नागपुर, महाराष्ट्र 
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